Fitness

Gym जाना दिनचर्या में शामिल होने पर हर दूसरा व्यक्ति अस्वस्थ नज़र आने लगता है। राह चलते को देखकर ही विचार आने लगते है कि इसे weight उठाना चाहिए, उसे crunches करने चाहिए आदि…आदि। हालाँकि gym वग़ैरह द्वारा दुनिया की केवल 4% जनसंख्या तक ही पहुँच बनाई है। सामान्य तौर पर आम आदमी या तो अनिद्रा या फिर मोटापे से पीड़ित है। हालाँकि fitness के प्रति सावचेतना आमजन में अवश्य बढी है किन्तु fitness freak नहीं बन पाए ।पैदल चलना अधिकांश की दिनचर्या में है किन्तु कहीं पढ़ा – ये बूढ़ों , बीमारों की कसरत का साधन है। अत: साधारणजन के लिए इसके महत्व पर शक पैदा हो गया। आम अवधारणा है कि -खुली ताज़ी हवा में व्यायाम की होड़ थोड़े हो सकती है- बड़े बेमन से इस ओर रूख किया जाता है । परन्तु उसके बाद तो बिलकुल नई दिनचर्या की शुरूआत प्रतीत होती है। प्रणबद्ध लोग जिस तरह नौकरी में गाहे-बेगाहे अवकाश नहीं लेते वैसे ही यहाँ भी नहीं। सही मायने में तो fitness अब भी हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है।जब शरीर जवाब देने लगता है और डाक्टर चेतावनी दे देते हैं तभी हम इस ओर रूखसत होते हैं।मोटी /थुलथुली सोसायटी कई चीज़ें इंगित करती है-कर्मठ/ संयम/दृढ़ता का न होना।अत: इसके दुष्प्रभाव व्यक्ति तक ही सीमित न रहकर समाज को भी प्रभावित करते हैं। और अंतत: वह एक आलसी /असंयमी लोगों की जमात बनता जाता है। रोज़ एक घंटे के लिए कसरत- जब आप सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने शरीर के लिए कर्मरत हैं- तो यह स्वार्थ भी समाज के लिए फ़ायदेमंद है।कार्यशील व्यक्तियों की ऊर्जा में इज़ाफ़ा , चिकित्सा पर ख़र्च कम।शुरूआत में सिर्फ़ aerobic exercise ही scheduleमें होती हैं।strength training के बारें में अवधारणा है कि यह सिर्फ़ bodybuilders के लिए है।किन्तु पता चला – यह सम्पूर्ण fitness के लिए है। सही है जब तक हम किसी क्षेत्र में कूदते नहीं है- फ़ौरी तौर पर ग़लत धारणाएँ बनाए रखते हैं। लोग रातों रात परिणाम चाहते हैं। पर जुदा सोचे- जब आपने शुरू कर दिया है तो यह तय है कि एक न एक दिन मंज़िल पा ही लेंगे। ज़रूरत है बस PRP की – patience, regularity, proper diet की। अतिशीघ्र परिणाम चाहने वालों के लिए- शोध अनुसार वज़न नियंत्रण में कसरत व भोजन का अनुपात 20:80 का है। सप्ताह में एक दिन मनमर्ज़ी के खानपान की छूट है।किन्तु वह भी अनियंत्रित न हो। उधर चीनी इंडस्ट्री ने बदनाम किया घी इंडस्ट्री को- मोटापे के लिए ज़िम्मेदार ठहराने में।तात्पर्य अनियंत्रित मात्रा चीनी की भी घातक है। अक्षय कुमार का कथन -“जब भी sweet craving हो brush कर लेता हूँ ।”- प्रेरणास्पद है आत्मसंयम की दृष्टि से । कुछ लोगों की मनुहार भी वज़न पर भारी पड़ती है।सलाह है लोगों को तुरन्त नाराज़ करना शुरू कर दीजिए।