Journalist

जिस दिन परीक्षा परिणाम आया  उस दिन से ही घर में कोहराम मचा था । अपराध बोध सा हो रहा था ।  माँ ने बात करना बंद कर दिया। बाबूजी देखते ही मुँह फेर लेते। बाक़ी सदस्य अभी छोटे होने  के कारण तटस्थ थे।  वरना चौतरफ़ा अंगारे बरस रहे होते।  ऐसा माहौल असफ़ल  हो जाने पर तो स्वीकार्य होता पर प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण  कर लेने पर ऐसा विरोध अचंभित  कर देने वाला था । दिक्कत परिणाम नहीं बल्कि परिणाम का भी परिणाम था  ।

विरोध का आलम तो ऐसा था जैसे मैं पसंदीदा पेशे  के बारें में नहीं बल्कि पसंदीदा जीवन साथी के बारें में बात कर रही थी। खाप पंचायत घर में ही विराजमान हो गयी । अलग़ सोच रखना अपराध कारित करने समान ही मानी जाती है।

परम्परावादी परिवारों में जहाँ चप्पल चूड़ी खरीदने में भी घर का कोई सदस्य   विनायक की तरह साथ रहता है वहां पत्रकार बनना तो दूर इसके बारें में सोचना भी गुनाह है। किसी परंपरागत किस्म की पढाई या नौकरी के क्षेत्र तक तो मेरा स्वतंत्र निर्णय स्वीकार हो सकता था किन्तु पत्रकारिता तो स्वछंदता की श्रेणी में था।

मेरे पत्रकार बनने की इच्छा व्यक्त करने पर माँ अवाक् रह गयी और बाबूजी अख़बार को नीचे करते हुए चश्मे के पीछे से झांकते हुए बोले ” क्या कहा ” . मैंने फिर से दोहराना चाहा  इस गरज़ से कि शायद ढंग से सुनाई नहीं दिया हो। पर बाबूजी ने वाक्य ” मैं पत्रकार ……. ” पर ही रोक दिया। इससे आगे तो उन्हें सुनना ही गवारा नहीं था ।

मैंने झिड़के जाने की आशंका के साथ धीरे से पूछा  “फिर प्रवेश परीक्षा क्यों देने दी थी ” ” वह तो बस अनुभव के लिए थी। और जगह काम आएगा ” मैं हतप्रभ। इम्तिहान देना और बात है और ऐसे मरदाना  पेशे में जाना दूसरी  बात है। ” बाबूजी पेशे कब से मरदाना जनाना होने लगे ” ” तू चुप कर ” बाबूजी कुछ बोलते उससे पहले ही माँ बोली। “सब देखना पड़ता है।  जहाँ अंधेरों का पता ना आधी रात का। कहाँ कहाँ भागती फिरोगी। .यहाँ तो दिन के उजाले में भी इम्तिहान दिलाने तक साथ गए हैं और कह रही हो  रात के अंधेरों में अकेली घूमती फिरोगी । ” ” अरे माँ जरूरी थोड़े है की सिर्फ रात की ही पारी होगी दिन की भी हो सकती है। और फिर अन्य किसी नौकरी में वक़्त बेवक़्त जाना पड़ा तो ” मैंने पूछा। ” ज़्यादा मत बोल। कह दिया नहीं तो नहीं ” माँ ने फ़रमान सुना दिया।”और डॉक्टर बनती तो रात को रोगी देखने नहीं जाना पड़ता ?” ” फालतू  की बहस ना करो।  कह दिया ना  की नहीं जाना है।  ” माँ बोली। ” पुरातनपंथी न बनो माँ।  काम में रुचि महत्वपूर्ण होती है। ” पर माँ टस से मस ना हुई। ” कितना जोख़िम भरा है कुछ पता भी है। रातों रात गायब कर दिया जाता है और फिर कभी पता नहीं चलता।”  मेरी जुबान भी फिसल गयी और कह दिया ” आजकल तो पत्रकार महिलाओं के काम पर फिल्मे भी बनने लगी है ” बस यही मेरी चूक थी। जैसे मैंने फिल्मों में काम करने के लिए कह दिया हो। माँ बिफर पड़ी – ” किसी के काम पर एक आध फिल्म क्या बन गयी  बस वही सब कुछ अब तुम्हे भी करना है ।  इधर कई अगुआ भी तो हो गयी जिनका बाद में पता भी ना चला। ”    

 मैं कसमसा कर रह गयी। और अपने कमरे में लौटकर सुबकने लगी।

” काश इन्हे कोई समझा पाता। हर पेशे की खामियां और खूबियां होती है। “हर पेशा अपने आप में अनूठा और अपनी अहमियत रखने वाला  होता है। समाज की मूँझ में सारे तानो बानो की गूंथ होती है। शेक्सपियर का कथन जो हमेशा सिर्फ रटा करते थे अब उसका मर्म समझ आ रहा था  कि दुनिया रंगमंच है और हर एक व्यक्ति कलाकार – को आगे बढ़ाते हुए – और उसकी भूमिका निश्चित है। उसे वही निभानी पड़ती है। वह अन्य नहीं हो सकता।

बड़ी मिन्नतों के बाद अंततः माँ बाबूजी मान गए।  

कोर्स पूरा होने के साथ ही एक मीडिया हाउस में नौकरी भी मिल गयी।  

राजधानी में छात्र संघ चुनाव की रिपोर्टिंग करनी थी। सुबह आठ बजे मतदान प्रारम्भ होना था। शाम की बस पकड़ मुँह अँधेरे पहुँच जाने का निश्चय किया। यात्रा के दौरान नींद आने का प्रयास ही करती रहती है पूर्णतया आती नहीं है।  फिर भी चूक ना हो जाए इसलिए कंडक्टर को भी उतरने की जग़ह के बारे में बता दिया था। इफको चौक गया …..    फ़िर कापसहेड़ा …..  ठण्ड और थकान के मारे नींद के झोंके आ जा रहे थे। सोते हुए सज़ग रहने की जब चेष्टा की जाती है बड़ी अज़ीब सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। दिमाग़ इस मुग़ालते में रहता है मानो उसे सब पता चल रहा है जबकि आधे समय वह सोया रहता है। खैर कंडक्टर की टेर  से जाग खुली। “धौला कुआँ    धोला कुआँ   “. मैं अचकचा कर उठी। अधखुली आँखों को पूरा खोल खिड़की से बाहर देखने की कोशिश करते हुए। पर बस की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि बाहर की स्तिथि कुछ स्पष्ट नहीं हो पायी। इतने में फ़िर कंडक्टर चिल्लाया “धौला कुआँ    धोला कुआँ   “. लोग अपनी बेचैनी का हस्तांतरण दूसरों में कर देते हैं।  मैंने फ़टाफ़ट पैरों में जूते डाले और थैला उठाया। ज्यादा कुछ मेरे पास था नहीं।

हिचकोले खाती बस का गलियारा पार कर धड़ाम से बस के दरवाज़े से नीचे लगभग कूदना पड़ा। बाहर उतर कर लगा काफ़ी बदलाव हुआ है। साल भर पहले ही तो आयी थी। “धोला कुआँ”  लिखा बोर्ड भी हटा दिया लगता है। जग़ह भी अधिक खुली अधिक चौड़ी लगी। लेकिन कहीं तो कुछ लिखा होना चाहिए?  ये कौनसी जग़ह है ? अब मैं लेने आने वाले ड्राइवर को कैसे समझाऊँ कि मैं कहाँ खड़ी हूँ। मैं इधर उधर किसी साइन बोर्ड / milestone के लिए देखने लगी।  पर कुछ नहीं दिखा। विचित्र सी स्तिथि थी।

इतने में फ़ोन बजा। ” कहाँ हैं आप।”  मैंने कहा धौला कुआँ बस स्टैंड पर। ड्राइवर  ने कहा ” वहां तो मैं खड़ा हूँ। आसपास देख कर बताईये कहीं कुछ लिखा हो तो।”  कुछ आशंका हुई। कहाँ उतार गया कंडक्टर। आस पास कोई दिखाई भी नहीं दे रहा था।  सर्दियों की भोर में किसी के सड़क पर होने की उम्मीद करना भी बेमानी है।

“कुछ पता नहीं चल रहा है बस केवल लम्बी सड़क ही सड़क दिखाई दे रही है।”  मैंने वाक्य समाप्त किया ही था कि एक कार सररररररर्र करती पास से निकल गयी। कुछ समझ पाती इतने में वह पुनः लौटती सी दिखाई दी। मैं बचने के लिए पीछे की ओर दौड़ी। उधर ड्राइवर ने परिस्थति को भांपते हुए कहा “फ़ोन चालू रखना , किसी भी हालत में बंद मत करना , और कोशिश कीजिये आस पास का कुछ भी बता पाओ मैं पहुँच जाऊँगा। ”  पास ही बने  पुल पर दो पुलिस वाले दिखाई दिए। पर पुल की ऊंचाई इतनी अधिक थी कि अगर मैं यहाँ से चिल्लाऊँ तब भी उन्हें शायद ही सुनाई दे। दिल इतना जोर से धड़क रहा था जैसे फट कर बाहर आ जायेगा।

बदहवास सी इधर उधर देखने लगी तभी बहुत दूर कोई साइन बोर्ड नज़र आया।”दिखा …….  एक साइन बोर्ड ” मैं अटकती सी बोली।  “किसी भी तरह जल्द से जल्द उसे पढ़ने की कोशिश कीजिये ।  डरिये मत ।  मै शायद बहुत नज़दीक ही हूँ।  मैं पहुँच जाऊँगा। “ड्राइवर ने हिम्मत बढ़ाने की गरज से कहा।    मैं दौड़ कर सड़क किनारे प्लेटफार्म पर चढ़ गयी और दूर दिखाई देने वाले साइन बोर्ड की तरफ भागने लगी। हाँफते हाँफते मैं उसे किसी तरह पढ़कर बता पायी।  उस कार के मेरे नज़दीक  पहुँचने से पहले ही ड्राइवर मुझ तक पहुँच गया और हम वहां से रवाना हो लिए।

आँख बंद करते ही माँ बाबूजी के चेहरे सामने आ गए।

एक दशक गुज़र गया जब तुम अंतिम बार मिले । कल की ही सी बात लगती है। एहसासों पर समय का जंग नहीं लगता। मेरा प्रथम और तुम्हारा यूनिवर्सिटी का अंतिम वर्ष था। पुस्तकालय में विभिन्न प्रकाशकों की पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी थी। यह सच है कि मैंने पहले पहल किताबों से प्रेम किया और वह आज भी सरस बना हुआ है। उस दिन भी परीक्षाओं के बीच मैं प्रदर्शनी में किताबें लेने ही पहुंची थी क्योंकि उसका आयोजन मात्र दो दिन होना था और इम्तिहान अभी लम्बे चलने थे। इम्तिहानों की शायद फ़ितरत भी यही है।

मैं किसी भी हालत में चूकना नहीं चाहती थी वैसे भी छोटे शहरों की विडंबना है कि यहाँ पुस्तक प्रदर्शनियां ना के बराबर लगती है। एक बार चूक जाओ तो फिर अगली का कोई पता नहीं। उस पर  प्रकाशकों की शिकायत रहती है कि पाठक वर्ग नहीं है। अब तो खैर हालात दूसरे हैं। बस अपनी इच्छा की बारहखड़ी बताओ और ऑनलाइन बाज़ार उसे पूरा करने में तुरंत जुट जाता है। हालांकि ऐसी ख़रीददारी में  वो बात नहीं। शब्दों की चाशनी चख चख कर क़िताब ढूंढने का जो मजा किसी प्रदर्शनी या पुस्तकालय में है उसका कोई मुक़ाबला ही नहीं है।

उस दिन मुझे असमंजस में पड़ा देख तुमने पूछा था क्या किसी विशिष्ट लेख़क या क़िताब को ढूंढ रही हैं ???? मैंने अचकचाकर कहा ” नहीं ऐसा तो नहीं है। बस कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि इनमें से कौनसी छोडूं। ” तुम मुस्कुराये बिना नहीं रह सके और कहा ” तो सब ले लो ” “वह भी संभव नहीं “मैंने कहा। तुमने कुछ बेहतरीन पुस्तकों से परिचय कराया।

फिर कई बार यूनिवर्सिटी की कैंटीन में अभिवादन हो जाया करता था। तुम प्रतियोगी परीक्षाओं  की तैयारी कर रहे थे और शायद किसी एक में तुम्हारा चयन हो भी चुका था। दिमाग के साथ बातों में भी होशियार थे। कभी एक गायन प्रतियोगिता में गजल गायक जगजीत सिंह ने किसी प्रतिभागी को उसकी गायकी में बस एक ही सुधार की आवश्यकता बताई थी – “यू शुड फॉल इन लव ” . मैं अब अच्छे से  समझ पा रही थी।

उस दिन कैंटीन में लंच करते करते बोले ” you would be a good partner “. “how could you say” मैंने पूछा। बस साथ खाने वालों का ख़्याल रखते देख कर । खाने से याद आया तुम्हारे शहर में जाने पर खाना तुम्हारे घर पर तय होता वह भी मेरी पसंद का। तुम्हारे दोस्त मेरे दोस्त। तुम्हारे गुरु मेरे गुरु । समय तो समय था। सुनहरा हो या श्यामल। बीत जाता है।

किस्मत के खेल से मैं तुम्हारे शहर आगे पढ़ने चली गयी और तुम मेरे शहर में नौकरी के लिए रह गए।  आपस में हम मिलते ना मिलते पर एक दूसरे के घर वालों से अवश्य मिलते। दुआ सलाम कर आते। एक आध दिन की छुट्टी में अपने अपने घर आना संभव ना हो पाता था। अतः एक दूसरे के घर की ओर  रुख कर लिया करते थे। दुनिया की भीड़ में अकेले होने के बोध से बच जाते।

तुम्हारा चयन विदेश सेवा में हो गया।

बदले माहौल में सब बदल गया। आहत हुई। समझदार को इशारा ही काफी होता है। मैंने अपने कदम खींच लिए।

उधर साहित्य में रूचि के कारण इसी में अपना भविष्य बनाने के लिए प्रयासरत थी। मेरा पी एच डी के लिए विदेश की यूनिवर्सिटी में चयन हो गया। और मैं चली आयी।  

संवेदनशीलता मुझे पीछे खींचती ले गयी। और तुम्हारी जिंदगी रफ़्तार पकड़ चुकी थी।

डॉक्टरेट के दौरान मैंने अपने आपको बहुत व्यस्त  कर लिया। सुबह निकलती शाम को जब पहुँचती तो थक कर इतना चूर हो जाती कि कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिलता। तुमसे दूरी के बाद मैं भी  कुछ ऐसा ही जीवन चाहती थी।

इसी दौरान क्रोनिए से मुलाकात हुई । नीदरलैंड वासी। मैं मज़ाक में कहती उसके नाम से मुझे “हैंसी क्रोनिए” याद आ जाता है। वह कहता वही समझ लो।

यहाँ  शुक्रवार को ही लोगों को सप्ताहंत  का बुख़ार चढ़ जाता था। शनिवार को  ख़ुमारी परवान पर होती जिसमें  रविवार शाम आते आते उतार आता। शुक्रवार का लंच सब एक साथ बाहर ही करते – गाइड फेलो सब। हाँ  पैसे अपने खाने के खुद ही देने पड़ते। पहले पहल इस रस्म से अनजान जब हर कोई अपनी जेबें टंटोल रहा था खाने का भुगतान यह सोचते हुए  कर दिया कि अगली बार कोई और कर देगा। पर अगली बार भी पाया कि स्तिथि वही है। और भुगतान इस बार भी स्वयं को ही करना है ।  खुद को कहा कि किसी मुग़ालते में ना रहो। दुनिया की तरह व्यावहारिक होना ना मुझे तब आया और ना अब ।

किसी नए शहर को समझते हुए बौरा जाना शायद आम बात है। उस दिन ट्राम पकड़ने में भी  पिछड़ गयी। सब साथी चढ़ गए। बड़ी हास्यास्पद सी हालत थी। एक तो उनकी गोलगोल मुँह ही मुँह में बोली जाने वाली अंग्रेजी , जिसके लिए बेचारे कान हर वक़्त खड़े रहते रहते थक जाते थे ऊपर से फलाना जगह के लिए बस नहीं मेट्रो फलाना जगह के लिए मेट्रो नहीं ट्राम। उलझन में पड़ जाती थी कहाँ के लिए क्या। सीधा सीधा क्यों कुछ नहीं।

उधेड़बुन में ही थी कि क्रोनिए वापस ट्राम से उतरता दिखा। आकर बोला ” what happen ” फिर हम अगले फेरे में गए। जिंदगी की भूलभुलैया वाले फेरे मुझे कभी समझ न आए। मैं दिल को और अधिक तकलीफ़ देना नहीं चाहती थी। मैंने इसके कपाटों पर सदा के लिए ताला ठोक दिया । बार बार टूटने से वे वैसे ही चरमरा गए थे।

हम बाद की हर पसंद में पहली पसंद को ही ढूंढ रहे होते हैं। और जिसकी प्राप्ति की सम्भावना करीब करीब  शून्य होती है। फिर एक दिन तुम्हारा मैसेज आया कि तुम किसी कांफेरेंस में इस शहर आये हुए हो। पर शहर की दूरियां और काम की प्ररिबद्धताओं के चलते हम एक दूसरे को वौइस् मैसेज ही भेजते रह गए और मिलना ना हो पाया। वह शायद किस्मत में ही नहीं था और हम यूं ही कठपुतली बने हुए घूम रहे थे।

मैंने यहाँ  के दूतावास में सांस्कृतिक प्रतिनिधि हेतु आवेदन किया। ख़ुश हुई प्रवेश मिला। पर अनुमति पत्र पर तुम्हारे हस्ताक्षर देखकर ठिठक गयी। पत्र  में दी गयी मियाद में मैंने केंद्र से कोई संपर्क नहीं किया। अंतिम दिन केंद्र से एक कॉल आयी। कहा गया केंद्र प्रमुख आपसे बात करना चाहते हैं – मैं चुपचाप फ़ोन पर बनी रही। तुम थे लाइन पर। बोले – ” देखो तुम्हारा चयन मेरे यहाँ प्रमुख के तौर पर आने के पूर्व हो चुका था। अनुमति पत्र पर मेरे हस्ताक्षर अवश्य हैं। चाहो तो ज्वाइन कर सकती हो। “

विचित्र परिस्थति में बिना अधिक गणना परिगणना के मैंने सहमति दे दी। हमारा आमना सामना कभी न हुआ सिवाय दूतावास  में  प्रथम दिन के। जब उपस्थिति मुझे तुम्हारे चैम्बर में ही देनी थी। एक औपचारिक मुलाक़ात। चाय पीते हुए भी मैं सामान्य नहीं थी। खैर बाद में कभी मिलना नहीं हुआ ना  बुलाया गया ।

दोपहर के खाने के वक़्त केंद्र खाली सा हो जाता। वहां इस दौरान भी लोग किसी न किसी गतिविधि में भाग लेना जारी रखते । कोई दोपहर के खाने के बजाय तैरने चला जाता, कोई स्क्वॉश खेलने। कुलमिलाकर केंद्र   में दोपहर में कोई नहीं रहता। मैं भी आसपास टहलने निकल जाती। किसी शहर को जानने का यह तरीका अच्छा लगा।

इस सब के बावज़ूद मैं उस माहौल में काम नहीं कर पा रही थी। दिखने में सब कुछ सामान्य ही था पर मेरे अंदर की कसमसाहट ने मुझे बेचैन कर रखा था। तुम्हारे पास ना होने पर भी हर कागज में हर  दस्तावेज़ पर तुम्हे ही महसूस करती। भूलना भुलाना तो दूर यहाँ तो हर क्षण तुम्हारी उपस्थिति थी। उसी से असहज़ हो जाती।

मैं सहज होने निकल पड़ी। पर ऐसा हो पाया इसमें आज भी संदेह है।

जिंदगी में कब गलत डोर पकड़ ली या सही छूट गयी कुछ समझ नहीं आ रहा था। और दिनों की तरह ही उस दिन की भी शुरुआत हुई थी। इंसान की नासमझी ­-  किसी दिन की  तो दूर किसी  क्षण तक  की नियति पता नहीं होती  और  फिर भी वह मान कर चलता है कि जैसे अन्य दिन सामान्य रूप से शुरू होकर समाप्त हुए यह भी हो जायेगा। हर दिवस को सामान्य  मानने का उसमें अनुकूलन  हो चुका होता है। या कहे ऐसी कल्पना गढ़ लेता है। क्लोरोफॉर्म लिए हुए सा आधा सोया हुआ सा ही जीता है। इसे नीम बेहोशी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ भी जीवन कुछ ऐसा ही चल रहा था। चल रहा था या यूँ कहें लुढ़क रहा था। पर “सब दिन न होते एक समाना ”  ।

वह दिन कतई सामान्य नहीं था। वज्रपात हो गया था जेल जाने का सुनकर ही। मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था अँधेरा सा छा गया था। पराकाष्ठा की हद तक तड़प उठा । दुःख /दर्द जब तीव्रतम होता है तो विचारों का प्रवाह रुक जाता है आदमी विचार शून्य  हो जाता है। जिन्दा था या मृत -स्पष्टतया तो कुछ भी नहीं। फिर भी अस्तित्व का अहसास था।  

साधारण आदमी कोर्ट -कचहरी पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। अतिरिक्त दूरी बनाये रखता है। और फिर यहाँ तो सीधे सीधे उन्ही से वास्ता पड़ गया। एक कहावत है कि दुनिया में सबसे दुखियारी व्यक्ति ही कोर्ट और अस्पताल पहुँचते है। मंदिर के आगे से व थाने  के पीछे से निकलने की सलाह बड़े बुजुर्ग दिया करते हैं। पर जब क़िस्मत ही वहां धकेल देती है तो फिर कहावतें और सलाहें दुबकी सी नज़र आती है। और आदमी इन निषिद्ध जगहों पर ही  पड़ा मिलता है।

शहर की नामी गिरामी स्कूल में पढ़ते वक़्त बेहतरीन कॉलेज से पास होते वक़्त कभी एक क्षण के लिए भी नहीं सोचा था कि दुर्दशा की हद में यहाँ तक आना पड़ेगा। अनुशासित छात्रों में गिनती थी। संभ्रांत घरों के बच्चे साथी थे। कहा भी जाता है “man is known by the company he keeps” आप आदमी को पहचानना चाहते हो उसके आस पास के लोगों को देख लो। निर्णय हो जायेगा। MBA कर अच्छी प्राइवेट फर्म में नौकरी कर रहा था।

जब आप दुनिया की नज़रों में कमाने खाने वाले हो जाते हैं तो आपको जिम्मेदारियों का विस्तार करना पड़ता है। या यूँ कहें जब आप स्थिर हो जाते हैं तो आपको अस्थिर करने की मुहीम शुरू की जाती है। वह कम बोलती थी। पर मुझे भी इससे कहाँ गुरेज़ था। मैं खुद भी तो ऐसा ही था। मेरी कंपनी ने मुझे नए शहर भेज दिया। उसकी चुप्पी और बढ़ गयी। पूछा भी। वह टाल गयी। मुझे भी लगा शायद नए शहर में मन ना लगा हो। बाहर ले जाने पर भी वह अन्यमनस्क ही बनी रहती। अंतर्मुखी स्वभाव का व्यक्ति न कुरेदता है न ही कुरेदा जाना पसंद करता है।

ऑफिस मुझे मुहँ अँधेरे ही निकलना पड़ता था। रिश्तों की तरह ही शहरों में दूरियाँ होना अस्वाभाविक बात नहीं। हर रोज की तरह उस दिन भी उसे सोया छोड़कर दरवाज़े को धीरे से बंदकर रवाना हो गया था। आदेश ,उपदेश , फ़ोन , बैठकों में कब दिन बीता पता ही नहीं चला। दफ्तर से रवाना होते वक़्त फ़ोन बजा। जैसे ही उठाने की तैयारी की वह बंद हो गया। मैं भी थोड़ी जल्दी में था। समय पूरा हो जाने के बाद  दफ्तर में  ऐसा लगता है जैसे कहीं अनधिकृत रूप से बैठे हों। फ़ोन दुबारा बजा। मैंने भी सोचा अब चलते चलते ही बात की जाये अन्यथा घर पहुँचने में और देर हो जाएगी। सवेरे से शाम तक समय ,ऊर्जा सब इसी हवन कुंड में होम दी जाती है। अनजान नंबर से कोई कॉल आ रही थी।

फ़ोन उठाया तो उधर से आवाज़ आयी “आप Mr शर्मा  बोल रहे हैं ”  मेरे हाँ भरने पर कहा  “जल्दी घर पहुंचे। आप की पत्नी की हालत बहुत ख़राब है। ” मै सन्न रह गया। अचानक क्या हुआ। सुबह तो सब ठीक ठाक था। मेरे कुछ पूछने से पहले ही अगले ने फ़ोन रख दिया। मैंने भी दुबारा कोशिश कर वक़्त जाया करने के बजाय भागकर टैक्सी को रोका। आधे पौन घंटे में जब घर पहुंचा तो वहां पर पुलिस और आस पड़ोस के लोगो की भीड़ जमा थी।  उन्हें किसी तरह धकेल कर आगे बढ़ा तो उसकी क्षत विक्षत जली हुई देह पड़ी थी। रसोई घर में हादसा हुआ बताया गया। वह कोई बयान नहीं दे पायी थी। और हमेशा के लिए खामोश हो गयी थी। उसकी इस चिर चुप्पी ने ही चीर डाला।

शक की बिला पर पुलिस मुझे पकड़ कर ले गयी। जिंदगी के झंझावातों का सिलसिला यही न रुका था। उधर घरवालों को जब पता चला तो माँ को हृदयाघात हो गया। उम्रदराज़ पिताजी रात रात भर जागकर माँ  की देखभाल करने लगे। माँ से पहले पिताजी चल बसे। मैं तारीख़ दर तारीख़ के भंवर में फँसता चला गया। मैं किसके विरुद्ध और क्यों लड़ रहा था। समझ नहीं आया। जीवन से कुछ और हासिल होना शेष ना था।

मेरा होना ही दोष था। मैंने अपना दोष मान लिया।

जिंदगी की रफ़्तार के बीच गाहे बेगाहे बचपन के खेल याद आ जाते हैं। आज इच्छा हुई पुराने खेलों को पुनः यादों में खेल लेने की। उनमे से कुछ अभी भी हिप्पोकैम्पस के पटल पर – धूल जमे से पड़े हैं। कुछ की शायद वहां से सफाई हो गयी है। जो खेल सबसे पहले याद आता है वह था -छुपम  छुपाई। शायद सर्व मान्य सर्व प्रथम। सभी ने कभी न कभी यह खेल  बचपन में खेला होगा ।  काफ़ी रोमांचकारी लगता था। जिसमें दोनों पक्षों की अग्नि परीक्षा हो जाती थी -ढूंढ़ने वाले और छुपने वाले की।

सबसे पहले दांव में हारने वाले को अन्य साथियों को ढूंढने की शुरुआत करनी पड़ती थी। शुरुआती हार से तिलमिलाया वह खिलाडी जल्द से जल्द खेल में वापसी के लिए प्रयत्न करता और दूसरों को खोज निकालने की फ़िराक़ में रहता। अंग्रेजी के शब्द रेसिलिएंस का इससे बेहतर उदाहरण बचपन में नहीं मिल सकता।

उधर छुपे हुए खिलाडियों की धड़कने इस सोच मात्र से ही बढ़ जाती कि कहीं वह ढूंढ नहीं लिया जाये। छुपी हुई अवस्था में खुद को बढ़ती धड़कनो के साथ छुपाये रखना ऐसा होता था मानों  कष्ट में  संयम की परीक्षा ली जा रही है।

खेल के अंत तक जद्दोजहद चलती रहती -एक हार के खोल को फेँकने के लिए आतुर दूसरे किसी कोने में अनंत काल तक बर्फानी बाबा की सी जमी हुई अवस्था में पाया जाता।

और खेल का अंत??? थकने पर या कानूनी भाषा में विवाद्यकों के उत्पन्न होने पर हो जाता।

दूसरा खेल दौड़। ऐसा लगता है जिंदगी की दौड़ जो इस खेल के साथ शुरू होती है कभी ख़त्म ही नहीं होती। समस्त  क्षमताओं को, चाहे वे आकार -प्रकार में कितनी ही नन्ही थी , समेटकर पूरे दम ख़म के साथ आँखे मीचकर दौड़ते थे। और खोलने पर पता चलता बाज़ी कोई और मार ले गया है। इसे क्या कहें -अँधेरे में रहना या अपने में ही डूब कर लुटिया डूबा लेना।

सुना है कुछ बच्चों को तो यहाँ पर भी कम्बख़्त अंग्रेज़ी ने मात दिलाई – बच्चों  को दौड़ में  झूझते देख माता पिता के उत्साह बढ़ाने की गरज़ से ” come on ” “come on ” कहने पर बेचारे  बच्चे माता पिता  के पास लौट आये। विडंबना है कि हम भारतीयों को मात्र अंग्रेजों ने ही नहीं अंग्रेजी ने भी कष्ट में डाला है।

तीसरा पकड़म पकड़ाई जिसे आजकल बच्चे “टैग ” कहकर खेलते हैं।पक्षपात की घूंटी तो  इस खेल के साथ ही ले ली थी। जैसे ही कोई अपना गिरफ़्त में आने को होता  उसे छोड़ देते, उसे भाग जाने देते। फिर चाहे दूसरे कितने ही भेदभाव करने के आरोप क्यों न लगाए।और जिसे दबोचना होता उसे पूरे दम ख़म के साथ दबोच कर ही दम भरते थे।

पहल दूज। सम्पति एकत्र व विस्तार करने की फाइनेंसियल एजुकेशन का बीज़ वहीँ रोपित हो गया था। खेल के घरों में से 80 प्रतिशत एक के पास और 20 प्रतिशत शेष  के पास  इकट्ठा  होने पर असमानताओं वाले समाज की तरह खेल वहां भी नहीं जम पाता । एक के सिकंदर /नेपोलियन बन जाने के बाद खेल ख़त्म हो जाता था। उधर सिकंदर /नेपोलियन को भी घरों को जीतते जीतते ऊब आने लगती थी कि वह इतनी सम्पति का क्या  करे। थक हारकर जीतने वाला वापिस अपनी सारी सम्पति / घरों का त्याग करता तभी खेल पुनः शुरू हो पाता। 

सतोलिया -जिसे रग्बी की तरह ख़तरनाक़ समझ अभिभावकों ने कम ही खेलने दिया पर इसमें ख़तरे  के साथ साथ फुर्ती की भी पराकाष्ठा थी। एक के ऊपर एक पत्थर जचाते वक़्त जिसे अंग्रेजी में “Hand Eye coordination “कहते हैं , की जबरदस्त आवश्यकता होती थी। आसान तो कतई नहीं था ऊपर से चोटग्रस्त होने की सम्भावना ने इसे करेला और नीम चढ़ा की श्रेणी में ड़ाल दिया।

Last but not least के खेल वर्ग में रस्सी कूद को डाला जा सकता है जहाँ अन्य साथियों का साथ मिल जाने पर कूद के साथ करतब भी दिखा देते अन्यथा “एकला चलो रे” की नीति पर अकेले ही खेल जमा लेते।

 “जी लिए एक बार फिर बचपन और खेल याद कर  “

रेल तो रेल है।  अनगिनत अनुभवों की रेल। कभी एक सीरियल देखा  था रेल यात्रा पर। और कुछ तो याद नहीं रहा पर रेल ज़ेहन में बैठ गयी। शुक्र है इंटरनेट का। खोजने पर सब कुछ मिल जाता है  बस याद भर बाकी होनी चाहिए। मिला। वह सीरियल भी। श्याम बेनेगल का “यात्रा”।  जब प्रथम बार रेल की यात्रा की तो बताया गया था कि रेल मंज़िल से कई किलोमीटर दूर छोड़ेगी पर तब भी यह मंज़ूर था क्योंकि यात्रा जो रेल से ही करनी थी। 

बाबूजी बताते हैं कि  बचपन में वह अपने ननिहाल सिर्फ रेलगाड़ी का धुआं देखने के लिए आते थे क्योंकि तब उनके गांव में रेल  नहीं थी और ननिहाल के पास से निकलती थी।

एक मित्र अनुसार उसने पंजाबी भाषा ही रेल यात्रा के दौरान सीखी थी।  बचपन में हर वर्ष  नानी के यहाँ पंजाब जाते वक़्त ट्रैक के किनारे हिंदी , अंग्रेजी , पंजाबी में लिखे विज्ञापनों को पढ़ सकने की बहन भाईओं से प्रतिस्पर्धा ने ही ये कमाल करा डाला।

मुंबई की लोकल – उसकी जीवन रेखा ।  सुना है यात्री उसमे धक्के से ही घुसकर धक्के के साथ ही निकल जाता है ,    को छोड़कर शायद यात्रा के समस्त साधनों में रेल सबसे ऱोचक और आरामदायक साधन है- घर के कमरे में पहिये लगा देने समान। फिर अपने कमरे में बैठे बैठे ही खेत , खलिहान , दूसरा शहर , अनजाने लोग , नयी संस्कृति  और गरम चाय सब कुछ।

मेट्रो कहे या आधुनिक रेल। तकनीक ने उसे रफ़्तार दी है,  सक्षम बनाया है। समुद्र को चीर कर कहीं उसके हृदयस्थल पर यात्रा कराती कहीं  गहरी गुफा नुमा सुरंगो में से पार कराती आधुनिक रेल।

कुछ और रूप भी। उन्हें रेल के एडवेंचर फॉर्म कहा जा सकता है -रोपवे और रोलर कोस्टर ।

रोपवे तो प्लेटफॉर्म छोड़ते वक़्त एक रूहानी अहसास दिलाती है -सब चीज़ों से ऊपर उठे हुए , बेहद हलके फुल्के। चहुँओर प्रकृति ही प्रकृति – कंदराएँ ,घाटियाँ , पत्थर , समुद्र अनंत आकाश तक।

रोलर कोस्टर को हल्का फुल्का साधन नहीं करार दिया जा सकता। एक tagline कहीं से याद आ रही है “tough people to go with it ” सचमुच बड़ा जिग़र रखने वालों के लिए है रोलर कोस्टर राइड । अनजाने में तो ये एडवेंचर ही सिद्ध होती है। कलेजा मुँह को आ गया। जीवन बीमा वालो की Adline  की तर्ज़ पर   प्रण किया  -” जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी ”  बस यही और आख़िरी बार।

जीवन की रेलमपेल में यात्राओं का अनुभव जारी रहेगा।

घर में रखी  पुरानी चीज़ों को खंगालते वक़्त स्कूल के ज़माने की कुछ अंकतालिकाएं सामने आ गयी ।  उनके साथ ही बीते ज़माने से एक बार फ़िर मिल आई। वैसे तो चीज़ों को अनावश्यक रूप से इकट्ठा करने की तरफ़दार नहीं रही पर पुरानी फोटो , स्कूल कॉलेज में बनाई कुछ ड्रॉइंग्स आदि आज भी सहेज़ कर रखी है। उन्हें याद स्वरुप रखने की हिमायती हूँ। यही कुछ चीज़ें हैं जो समय का चक्का पीछे घुमा देने में सक्षम है। छुटपन में किसी टीवी सीरियल में  “टाइम मशीन” को देखा था जिसमे कुछ लोग प्रवेश कर अपने भूतकाल में चले जाते थे। पुराना सामान भी मुझे उस “टाइम मशीन ” सरीख़ा सा लगता है।

अंकतालिकाएं सामने आने पर याद आया कटे हुए एक एक अंक ने कितना रुलाया था और अब मिले हुए अंकों को देखकर हंसी आती है सब के सब अब यादों की टोकरी में। भारी भरकम अंकों वाली मार्कशीट नक़ली सी लगी।

आज बापू पर सोपान जोशी द्वारा लिखित  किताब ” एक था मोहन ” पढ़ रही थी। हालाँकि पुस्तक किशोरों के ज्ञानवर्धन को लक्ष्य रखकर लिखी गयी है पर सोचा जब जानने की इच्छा हो तो उम्र को भुला देना ही अच्छा होगा। पुस्तक अनुसार मोहनदास करमचंद गाँधी को भी 58  फ़ीसदी नंबर ही मिले थे। और फिर भी बराक ओबामा आज भी कहते हैं  कि ” भारत के प्रति मेरे आकर्षण की मुख्य वज़ह महात्मा गाँधी है। ”  साठ फीसदी के आस पास , दो कम या दो ज्यादा, की अंक प्राप्ति पर्याप्त प्रतीत होती नज़र आयी। जिसमे सुधार कहें या प्रगति हमेशा गुंजाईश बनी रहती है।

नम्बरो का इतिहास खंगालते वक़्त याद आया विद्यार्थी जीवन में गणित का विषय सर्कस के शेर जैसा होता है जो  काबू में आ भी सकता है और नहीं भी । काबू में ना आने की व्यथा सिर्फ विद्यार्थी ही बयां कर सकता है। धूमिल सी याद है कि कक्षा 3 में किसी परख़ में ख़ाकसार को गणित में तीन नंबर मिले और साथ में एक चपत भी। शायद उस चपत का ही कमाल था कि तीन अंकों की वह छवि आज भी  पूर्णतः धूल धूसरित नहीं हुई है। पर नीचे से अव्वल रहो या ऊपर से कम्बख्त अंक डांट या उलाहना का ही सबब बने हैं। दसवीं में 99 अंक मिलने पर भी गुरूजी  नाराज़ हो गए , बोले “एक नंबर कैसे कटा ” .वे भी शायद निनान्ये के फेर में थे।

उधर स्कूल वाले जब  हर साल ग्रुप फोटो खींचकर शुल्क की पर्ची थमा देते थे तब अदा किये गए शुल्क के बदले  में प्राप्त तस्वीर की कीमत से वाक़िफ़ न थे जिसमे वक़्त को क़ैद कर थमाया जाता था। और सिर्फ भुनभुना कर रह जाते थे। उस उम्र में साल दर साल लिए जाने वाले ग्रुप फ़ोटो का महत्व समझ से बाहर था।

मह्सूस हुआ सुकून केवल आगे बढ़ने में ही नहीं कभी कभी पीछे लौटने में भी है।

उस दिन   सुबह से ही अच्छा महसूस नहीं हो रहा था । मैं इस घर में तब से काम कर रही थी जब मालिक का बेटा तीन साल का था और अब वह कॉलेज की पढाई पूरी कर चुका था।  पति के हृदयाघात से मौत के बाद अपनी तीन नन्ही बेटियों को माँ के पास छोड़  मैं रोजी रोटी के लिए निकल पड़ी थी। और कोई गुजारे का साधन ही नहीं था।

पहले सोचा था बेटियों को आस पास के किसी पालना घर में भेज दिन में कहीं काम कर लूँगी और फिर शाम को खुद उनकी देखभाल कर लिया करूंगी।

पर पालना घर का शुल्क मेरी सामर्थ्य से परे था। माँ ने ढाढस बंधाया कि “ देख थोड़े दिनों की बात है अभी बच्चियां  छोटी हैं तुम्हारे काम पर जाने के बाद अकेले न रह सकेगी ।  समय एक सा नहीं रहता ये  कुछ बड़ी हो जाएँगी  हो जाएँगी समझदार हो जाएँगी तब तुम उनको साथ रख लेना। । दिल को मजबूत करके उन्हें मेरे पास छोड़ दे।“

 अंततः मैंने अपनी बच्चियों को गांव में अपनी माँ के पास छोड़ने का मानस बनाया। हालांकि यह मेरे लिए बहुत मुश्क़िल निर्णय था क्योंकि मैंने उन्हें अपने से दूर कभी किया ही नहीं था। अब उनसे दूर रहने की सोच मात्र से मैं सिहर उठी । सब मुझे छोड़ छोड़ कर निकले जा रहे थे कोई दुनिया से और कोई घर से।  मैं तो बिलकुल अकेली हो गयी।

बच्चियों  को अपने से अलग करने के नाम से ही कलेजा मुँह को आ जाता। पर फिर किसी तरह दिल पर पत्थर रख उन्हें माँ के साथ भेज दिया।

भेज तो दिया माँ के साथ किन्तु रातों रोती रहती।

फिर एक दिन छुटकी  के साथ खेलने वाली बच्ची ने दरवाज़ा खटखटाया और कहा ” ऑन्टी क्या छुटकी मेरे साथ खेलेगी ” मैंने उसको तो प्यार से कह दिया ” नहीं बेटे। वह नानी के पास गयी है ” बच्ची वापस चली भी गयी किन्तु मेरी रुलाई छुटकी को याद कर कर के ऐसी फूटी की थमी ही नहीं।

सौभाग्य कहूँ या दुर्भाग्य काम भी बच्चे सँभालने का ही मिला। बच्चे के माता पिता दोनों काम पर चले जाते थे। दिन भर उसे खिलाना पिलाना सुलाना उसके इर्द गिर्द ही काम थे।  बच्चे में ही अपने बच्चों का अक्स  ढूंढ़ती थी।

बस फ़र्क इतना ही था अपने बच्चों  के बजाय दूसरों के बच्चे को संभाल रही थी।

मालकिन ने घर आने जाने का झंझट छोड़ वहीँ रहने को कह दिया। इधर मैं भी चारदीवारी को ही घर समझ रही थी। मेरे अलावा यहाँ और था कौन जिससे घर बनता। समय बीतता गया। घर के और कामों की देख रेख मेरे जिम्मे कर दी गयी थी।  

बच्चे बड़े हो रहे थे। लगा बस अब थोड़े ही समय की बात और है।

पर किस्मत  का  इम्तिहान अभी बाकी था। एक दिन सुबह मैं बिस्तर से नीचे पड़ी अचेत मिली। मुझे हॉस्पिटल ले जाया गया। पक्षाघात बताया गया। बरसों सेवा करने वाली को अब सेवा की दरक़ार थी।

पक्षाघात के बाद मालकिन ने मुझे मेरे पते पर पुनः लौटा दिया।

जब नौकरी का बुलावा आया तो ख़ुशी का पारावार ही नहीं था। पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। सोच में  पड़ गया किस किस को बताऊँ । लम्बे इंतज़ार और बीसियों जगह ठुकराए जाने के बाद किसी ने हाँ भरी थी। और मुझे तो बस काम चाहिए था।  बिना काम जिंदगी ही बेमानी लगने लग गयी थी। लगा कोई सूत्र तो मिले जिसको पकड़ कर आगे बढ़ा जा सके। उबाऊपन का बोझ इतना था कि साक्षात्कार में भी कह आया था  काम मेरा तनख्वाह आपकी।

घर छोड़कर शहर जाना था। पर मैं इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार था। ज़ेहन में था कि किसी शहर को अपना बनाने में कुछ ही समय लगता है। इंसान ही तो होंगे ,निभाया जा सकता है। फिर नए शहर का रोमांच ही  अलग था। नए लोग नया माहौल सब कुछ  नया नया। आस पास की हर चीज में जैसे ऊर्जा भर गयी हो। उत्साह इतना था कि मिलने वाले भी कहने लगे कि तुम बड़े सेल्फ मोटिवेटेड  रहते हो।

पर जितना उत्साह नौकरी की शुरुआत में था उतना ठहराव उसका रहा नहीं। कभी कभी तो लगता था कि नौकरी में भी एक तरह का रिश्ता निभाए जा रहा हूँ। ये दीगर बात है कि इसमें एक पक्ष मूर्त रूप  होता है और दूसरा अमूर्त। जहाँ इंसानी रिश्तों में हमारा साबिक़ा मूर्त रूप से पड़ता है नौकरी में दूसरा पक्ष अमूर्त / अदृश्य होकर अपनी भूमिका निभाता है।

संदेहास्पद लोग आते जाते रहते थे। कभी कभी तो किसी का चेहरा अखबार में मोस्ट वांटेड या हिस्ट्रीशीटर की श्रेणी में देखा हुआ सा लगता था। समझ में नहीं आ रहा था कहाँ फंस गया हूँ ।  जब तक व्यवहार न हो संबंधों का पता नहीं चलता । हालाँकि मेरी भागीदारी तो कागजों पर टंकण तक सीमित थी पर अब असहज महसूस कर रहा था।

बेमेल संबंधों की तरह काम को ढोता जा रहा था । जिसे ना निभाते बन रहा था ना छोड़ते। बहुत बार सोचा इसे छोड़ दूँ फिर दिमाग में आता दूसरे का क्या भरोसा है नहीं मिला  तो फ़ाकाकशी की नौबत आ जाएगी। दुबारा शून्य से शुरुआत करना नहीं चाहता था। पर बारम्बार माहौल की गर्द दम घोटती थी।

कभी मोहन राकेश की “आधे -अधूरे ” पढ़ी थी। पात्रों की घुटन भयानक रूप से महसूस की । इस नौकरी से रिश्ता कुछ कुछ ऐसा ही था। सब कुछ निष्प्राण सा। आगे अन्धकार था पीछे लौटने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहा था ।

अंततः निश्चय किया। जिंदगी में और काश बढ़ाना नहीं चाहता था। ना मिले कोई और। हर क्षण पश्चाताप से तो बच जाऊँगा कि मैं किसके लिए काम कर रहा हूँ। फिर किस्मत को किसने खोल कर देखा है क्या पता और अच्छी मिल भी जाये। इसी विचार के साथ फ़टाफ़ट इस्तीफ़ा लिख डाला। और आज़ादी के सपने देखने लगा।

कुछ रोज बाद। वाक़ई मेरे शब्द मुझे ही चिढ़ा रहे थे  क़िस्मत को किसी ने खोल कर नहीं देखा। मेरा इस्तीफ़ा हमेशा के लिए नामंजूर हो गया। और मैं ताउम्र का बंदी।

सोचा न था जिंदगी यूँ छिन्न भिन्न हो जाएगी। तुम्हारा जाना इतना अचानक हुआ  कि कुछ समझ ना पायी। उस दिन भी हमेशा की तरह समय पर आने का कहकर ही निकले थे तुम। पर वापस नहीं आये।  

खुद को समेटना आसान काम नहीं फिर यहाँ तो दुनिया ही सिमट गयी।

तुम्हारे होते गलियां , मोहल्ला ,शहर बतियाते से लगते थे। अब सब चुप रहते हैं। तुम्हारी कमी उन्हें भी खलती है। पिछले दस बरस का साथ था।

परिवर्तन कब आसान रहा है जड़ें छूटती सी लगती है। इस शहर की आदत पड़ गयी थी हमें । इतना अकस्मात इसे छोड़ना पड़ेगा सोचा न था। पर अब लगा अधिक दिन यहाँ रही तो अस्त व्यस्त हुई जिंदगी के बारें में सोचते सोचते दिमाग फट जायेगा।

फिर  बंधन आसानी से छूटता  भी तो नहीं है  वह रिश्तों का हो या शहर का ।    रह रह कर खुद को धोखा देने का मन बना रहता कि शायद सब कुछ सही हो जायेगा। पर वह ना होना था और ना हुआ।

आठ बरस की गुड़िया और मैं। वापस गांव चले आये। यही सोचकर कि अपनों के बीच मानसिक सम्बल तो मिलेगा। अपने तो मिले पर तुम्हारे बिना वह घर नहीं बन सका।

गांव  के स्कूल में गुड़िया को भर्ती करवा दिया। शहर जैसा तो नहीं पर ठीक था  जो चल रहा था उसे धकेल रही थी बस। कुछ बच्चों को पढ़ा आती। शाम होने से पहले घर? शायद नहीं … चारदीवारी में पहुँच जाती। गुड़िया तब तक अपने चचेरे भाई बहनो के साथ खेल रही होती।

समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था। गुड़िया भी बड़ी हो रही थी।

यहाँ गांव में खेत खलिहान के बीच पली बड़ी होने के कारण गुड़िया का खेती की ओर रुझान हो गया। उसने बारहवीं के बाद एग्रीकल्चर साइंस में स्नातक करने की ठान ली। पारम्परिक तो नहीं था पर खैर पढ़ना तो उसको ही था। सोचा कर लेने दो उसको अपने मन की।

कॉलेज से जब भी छुट्टियों  में आती तो खेती एक्सपोर्ट इम्पोर्ट ना जाने क्या क्या सपनो की सूची बताती। विचार था कि कुछ पैसे और जुड़ जाये तो ज़मीन खरीद लेंगे चाचा ताऊ के आस पास ही कहीं। आगे ये संभाल लेगी।  माँ फ़िर तुम बस आराम करना। मैं बस मुस्कुरा देती।

दिन निकलते गए। फाइनल ईयर के इम्तिहान आज ख़त्म हो गए।

शहर से शाम तक उसे यहाँ पहुँच जाना था। आखिरी बस भी आकर चली गयी। इंतज़ार और आशंकाओं से  दिल की धड़कने जैसे फटकर बाहर निकलने को थी। तभी उसका फ़ोन आया ” माँ मैंने अपने एक साथी से शादी कर ली है। गांव में चाचा ताऊ स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए मैं नहीं आ रही। “

जिंदगी एक बार फिर मुझे हतप्रभ कर आगे निकल चुकी थी।

बिट्टू कल से उदास थी। यह सोचकर कि नए शहर में जहाँ उसका कोई दोस्त नहीं है जन्मदिन कैसे मनेगा। ट्रांसफर बच्चों को नए शहर , संस्कृति से वाक़िफ जरूर कराता है पर उन्हें हर बार नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती है -नए दोस्त , नयी स्कूल आदि।  बस नए की शुरुआत मुश्किल होती है। शेष सब अच्छा होता है। फिर महानगरों की संस्कृति समझ से परे होती है।  सड़कों पर तिल भर की जग़ह नहीं होती है और आसमान छूती मंज़िलों में कभी कभार कोई आदमी दिखाई पड़ता है। लोग कहाँ से आते हैं कहाँ चले जाते हैं एक अजब पहेली है।  इमारत की लिफ्ट में कभी कभार कोई आदमी साथ चढ़ा मिलता है।  बाकि तो यहाँ बरसों बीत जाते हैं पडोसी का पता नहीं चलता।  ऐसे में बिट्टू की उदासी वाज़िब थी।

जन्मदिन वाले दिन बधाई देकर मैंने उसे तैयार होकर बाहर चलने को कह दिया। पर उसकी तैयारी में  उत्साह नहीं दिखा। एक ऑटो किया, चालक को पता समझाया और चल दिए । ऑटो के रुकने पर विस्मय भाव के साथ वह उतरी। ” पर पापा यह बिल्डिंग किसी रेस्टोरेंट की तो नहीं है। “बाहर चलने का कहने पर शायद उसने यही समझा था। मैं मुस्कुरा दिया।

 सात साल की बच्ची अब इतना अंतर तो कर ही पाती है। मैंने कहा ” हाँ बेटे। यह रेस्टोरेंट नहीं है।” आज हम एक नयी जग़ह आये हैं जहाँ तुम्हे कई नए दोस्त मिलेंगे।

और हम ऑटो वाले का किराया दे सीढ़ियां चढ़ गए।  वहाँ के बड़े हॉल में घुसते ही बिट्टू की ख़ुशी देखने लायक थी। हॉल गुब्बारों व रंग बिरंगे रिबन से सजा था। 10 -15 बच्चों ने एक स्वर में जब ” हैप्पी बर्थडे बिट्टू ”  गाना शुरू किया तो बिट्टू की ख़ुशी का पारावार नहीं था।  इतने सारे बच्चों का साथ पाकर वह खिल उठी। बच्चे थे इसलिए शीघ्र ही घुल मिल गए और खेलने खाने में मस्त हो गए।

 कल रात को ही एक दोस्त ने बाल आश्रम में जन्मदिन मनाने का सुझाव दिया था।