सामान्य !!

सामान्य कितना विशेष है। बंधा बँधाया जीवन जीते इसकी क़ीमत कभी समझ नहीं आई। रोज़ के रास्तों से ऊब होने लगी थी। दफ़्तर में खीझ मची रहती थी। अपनों से मिलने को शिद्दत से टालने लगे थे।दिन बदले। और बड़ी तेज़ी से। आज वे विज्ञापन बेमानी लगने लगे जिन्हें कल तक ललचाई नज़रों से देखते थे ।प्रचलित उक्ति थी कि इस दुनिया में सब संभव है बस हाथ में पैसा होना चाहिए। विडम्बना ऐसी कि पैसे ने भी ढाल बनने से इनकार कर दिया। शोहरत दौलत सब ढेर ।

जमाने में हम पर राज करने वाले के लिए देश ने दरवाज़े बन्द कर दिए। कभी किसी ने न सोचा कि कभी ऐसा होगा । जो कल तक सिरमौर थे आज बर्बादी के कगार पर है। फ़्रांस ,इटली,स्पेन, की दुर्दशा देखी।शहर के शहर भूतहा हो गए।शवों को ज़मीन मयस्सर नही हुई।

अविश्वास का आलम यह है कि हर पास खड़ा व्यक्ति यम का दूत नज़र आता है। मां अपने बच्चे को गले लगाने से डर रही है ।दरवाज़े पर घंटी से दहशत पैदा हो जाती है।

कोरोना कोई वाइरस ना हुआ ज़िंदगी के इंडेक्स का “करेक्शन मेजर” हो गया। हम में से कुछ को सुधारेगा कुछ को शायद कभी मौक़ा न मिलेगा। इन वर्षों की बेतहाशा गर्मी हो , जंगल की आग हो ,बेमौसम की बारिश हो या अब कोरोना का क़हर -कहना होगा सब गुनाहगार है क़ुदरत के कत्ल के , यूँ ही ये हवाएँ ज़हरीली नहीं हुईं हैं – तय है सामान्य अब विशेष हो गया है।