सम्मान

रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून, पानी गए न उबरे मोती मानस चून…पानी अर्थात सम्मान की जीवन में महत्ता I सार्वजनिक तौर पर सम्मानित करने की परम्परा / इतिहास की कब शुरूआत हुई -कहा नहीं जा सकता। परन्तु यह शाश्वत विषय है इसमें कोई दोराय नहीं ।अपने अंतरतम को टटोले तो सभी सम्मान चाहते हैं- स्तर शायद इतना महत्व नहीं रखता । चाहे किसी भी स्तर पर सम्मानित हों।

प्रतिष्ठा की बात चली तो एक स्थानीय किस्सा जानने को मिला-एक बार दरबार से एक सज्जन सम्मानित होकर लौटे । परन्तु उसके पश्चात उन्होंने सबसे बातचीत बंद कर दी। बहुत कुरेदने पर पता चला – जिस मुँह से दरबार से बातचीत की उस मुँह से अन्य (आम आदमी) से कैसे बातचीत करूँ …हद सम्मान की या कहें अहं की !!! दूसरा क़िस्सा प्रशासन से सम्मान न लेने का- पूछने पर बताया एक निकम्मे जानकार के सम्मानित होने के कारण उसके साथ इनाम नहीं लेना चाहते थे।

 वर्तमान व्यवस्थाएँ अजीबोग़रीब लगी- जहां व्यक्ति स्वयं प्रस्तावित करे -खुद को इनाम देने हेतु । चाहे अन्तराष्ट्रीय कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल हो,ऑसकर फ़िल्म फ़ेस्टिवल हो या स्थानीय व्यवस्था हो।साधारण बुद्धि कहती है प्रस्ताव तो सम्मान देने वालों की तरफ़ से आना चाहिए कि आपका काम प्रशंसनीय है। स्वयं तो अपनी दृष्टि में सदैव ही श्रेष्ठ है।खुद को कौन कम आंकता है।बहुत से ऐसे सज्जन (?) देखे हैं जिन्होंने सम्मान की क़ीमत को कम कर दिया और कुछ ने सम्मान के क़द को बढ़ा डाला।

ख़ुफ़िया सेवाओं में तो सुना है पूरे सेवाकाल में इनाम /प्रोत्साहन जैसी कोई परम्परा का निर्वाह नहीं किया जाता है।अन्य सेवाओं में इन दिनों एक नई प्रवृति देखने को मिल रही है- सम्मानित होने वाले कई शख़्स साल दो साल में ट्रेप हो गए हैं या अन्य कोई ऐसी ग़ैर क़ानूनी कार्यवाही में लिप्त पाए गए हैं जिसे मीडिया ने विशेषतया उल्लेखित किया है।ऐसे में फिर प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।कई दफ़ा विरोध में सम्मान को लौटाते हुए देखा है।वह भी ज़रा बचकाना सा कदम लगता है।सम्मान तो एक भावना है वस्तु नहीं कि जब चाहे ले ली और जब चाहे दे दी।शील्ड के साथ क्या सहूलियतें भी लौटा दी जाती हैं जो उसके साथ जुड़ी हुई आती हैं।शायद नहीं ।

सम्मान रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी मौजूद है-जैसे आभार ।यह भी तुलनात्मक रूप से समान ख़ुशी देता है और वह भी जब आपने किसी से कृतज्ञता जताने की आशा नहीं की हो ।सम्मान एक अहसास ही तो है-किसी प्रतियोगिता को जीतने पर ,किसी पत्र -पत्रिका में लेख छपने पर, जब कोई उम्मीद न हो तब तोहफ़ा प्राप्त करने पर या कार्यस्थल पर कभी-कभी किसी परिवादी की शिकायत सुन लेने मात्र पर उसके दुआओं की झड़ी लगा देने से जो अहसास होता है वह इज़्ज़त ही है,स्वयं को ऊँची पायदान पर पाए जाने के समान ही है।वैज्ञानिक तौर पर कहा जा सकता है कि इससे ख़ुशी का हार्मोन स्रावित होता है।नि:सन्देह यह आह्लाद / ऊर्जा का संचार करता है।संवेदनाओं का संवहन जारी रहे।