समझ, संस्कृति, अवसर का स्वागत द्वार भाषा

भारतेन्दु दशकों पहले कह गए थे कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल’। अर्थात मातृभाषा की उन्नति में ही सभी प्रकार की प्रगति निहित है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा दूर नहीं होती है।दूसरी भाषा के लिए इन्कार नहीं किंतु अपनी भाषा में जो रस आता है वह दूसरी में नहीं । हालाँकि व्यक्ति में अन्य भाषाओं की भी उत्सुकता वर्तमान रहती है। 

हमारे देश में अंग्रेज़ी तो वैसे भी अब ग़ैर रही नहीं । फ़्रेंच व जर्मन भाषा काआरम्भिक स्तर का ज्ञान होने के कारण कह सकती हूँ कि भाषाओं में कोई द्वन्द नहीं बल्कि उनका व्याकरण एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक है।अंग्रेज़ी जानने वालों के लिए फ़्रेंच सीखना आसान हो जाता है व अंग्रेज़ी तथा हिन्दी जानने वालों के लिए जर्मन। तुलनात्मक अध्ययन उन्हें समझने, याद रखने को भी आसान बनाता है।जैसे Bahn in German =Trainहम इसे अपने वाहन शब्द से तुलना करते हुए ज़हन में रख सकते हैं।Annanas हमारा अनानास ।veranda हमारा बरामदा। naam नाम।और ऐसे अनगिनत शब्द । 

हाल ही में दक्षिणी राज्यों में हिन्दी सीखने के विरोध पर घोर आश्चर्य हुआ।भाषाएँ तो जितनी सीखी जाएँ कम। समझ, संस्कृति , अवसर का स्वागत द्वार तो भाषा है ही।फिर भाषाओं से दूरी क्यों ।सरस हिन्दी व ज़हीन उर्दू कहाँ एक दूसरे की विरोधी है।याद रखने की क्षमता बढ़ना , food for brainजैसे अनेक कारण हैं जो भाषा सीखने से जुड़े हुए हैं।कबीर भाषा को बहता हुआ आँसू मानते थे।जो बहने वाले का हाल बयान कर दे।भाषा का तो उदय ही मानव जीवन को संवाद द्वारा आसान बनाने/ शुभता लिए है तो फिर किसी भी भाषा से दुराव क्योंकर।कितना कुछ जानने को मिलता है दूसरी संस्कृति के बारे में।किसी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई क्यों हुई जानने की गरज में आप संस्कृति से वाक़िफ़ हो जाते हैं।हालाँकि भाषाविद होने /परिपूर्णता के लिए निरंतरता एवं माहौल दोनों की आवश्यकता है किन्तु मात्र निरंतरता भी अपने आप में संतोषजनक परिणाम देने में सक्षम है।शब्दों ही शब्दों से उनके उत्सव , उनके खान-पान से वाक़िफ़ होने का मौक़ा मिलता है। 

ज्ञानपीठ सम्मान विजेता अमिताव घोष अनुसार अधिकांशत: अमेरिकी व अंशत: यूरोपी की तरह किसी भी भारतीय का एकभाषी रहना असंभव है।भारतीय अवशयंभावी रूप से बहुभाषी है।भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाएँ एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध रखती है।

भाषा सीखने का जहाँ तक सवाल है तो क्यों न बच्चों को जितनी सीखना चाहे अवसर प्रदान किया जाना चाहिए ।सालाना एक नई भाषा की शब्दावली सीखाने का भी नया प्रयोग किया जा सकता है।

दक्षिणी राज्यों में हिन्दी भाषा के पठन-पाठन का विरोध शोचनीय है। भाषा संवाद का माध्यम है विवाद का विषय नहीं । संकुचित सोच ही सीखने सीखाने पर पाबंदी लगा सकती है अन्यथा सीखने के लिए तो एक ज़िंदगी काफी नहीं ।यही नहीं भाषा कैसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ हो सकती है चीन से जाने। जहॉं देश 700 billion dollar विदेशी भाषा (अंग्रेज़ी) सीखने पर ख़र्च कर रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था की रफ़्तार ने दुनिया को पीछे छोड़ दिया। इस ग्लोबल दुनिया में संकुचित सोच का कोई स्थान नहीं|