शोर

एक शोर है मुझमें जो ख़ामोश बहुत है

खबर आई कि वर्तमान में दुनिया में अवसाद के मरीज़ 30% तक बढ़ गए हैं। हाल के माहौल व टी वी चैनल पर उदघोषकों को चिल्ला चिल्ला कर समाचारों का प्रसारण करते देख यह आँकड़ा अचंभित नहीं करता।यह शोर ही है जो हमारे अंतरतम को परेशान करने की हद तक जा सकता है।

हमारे आसपास कई ध्वनियां है।कुछ कलरव।कुछ कोलाहल ।कोलाहल शब्दों का भी और विचारों का भी ।अंतस् भी और बाह्य भी।अंतस् ग़ुस्सा, विचारों की उथल पुथल ,बाह्य अनर्गल वार्तालाप, वितंडवाद। भीतर विचारों की रेलमपेल है और बाहर भौतिकता की चीख। श्रव्य भी और पराश्रव्य भी। भीड़ में भी और बिना भीड़ भी।

शोर ध्वनि का ही प्रकार है ।जब ध्वनि अनावश्यक हो जाती है तो यह शोर का रूप ले लेती है।हालाँकि विज्ञान ने इसे मापने के लिए डेसिबल जैसी यूनिट दी है।80 डेसिबल से ऊपर की आवाज़ को अस्वास्थ्यकर माना गया है।साधारण मनुष्य डेसिबल मे मापने में अक्षम है। वह इसे ध्वनि की स्वीकार्यता / अस्वीकार्यता के आधार पर ही वर्गीकृत करता है।अनावश्यक शब्द भी इसी श्रेणी में आते हैं। सभी अति शोर है। हर शब्द ब्रह्मांड में प्रतिध्वनित होता है।और ग़ैरज़रूरी शब्द शोर बन जाता है।

अन्य तरीक़े से विचार करने पर शरीर मे बनने वाले bad cholesterol और good cholesterol LDL HDL- की तरह आवाज़ भी या तो शोर बन जाती है या संगीत। आवाज़ की तारतम्यपूर्ण अभिव्यक्ति ही संगीत है।संगीत तोषणकारी है।इस तरह शान्ति का मार्ग भी ध्वनि से ही होकर निकलता है !!

समस्त शोर पर विजय प्राप्त करना बुद्ध होना है। इसमें ध्यान की उपयोगिता हो सकती है।जब हम ध्यानस्थ होते हैं तो स्वयं के साथ होते हैं , बेहद शान्त होते है ।एक अन्य रीति ओशो अनुसारइस पूरे जीवन को एक कहानी के रूप में एक मिथक के रूप में लें…और आप फिर से वही नहीं होंगे।प्रयासरत।