शब्दों का साथ भी रूहानी

पुस्तक पढ़ने में दिलचस्पी के बारे में सोचते सोचते लगा कि क्यों न पुस्तक पढ़ने के अपने अनुभव को ही साझा कर लिया जाये। अनुभव कहता है कि टुकड़ों में प्राप्त सूचना कभी संतुष्ट नहीं कर पाती। सतही जैसे हाल के सोशल मीडिया का ज्ञान। किताब /लेख में ऐसे लगता है जैसे और गहरे -और गहरे जाते जाएँ। किताब पढ़ने के पश्चात के अनुभव को शायद ही किसी ने बुरा बताया है।

नई पुस्तक शुरू करना और समाप्त करना दोनों ही उपलब्धि का सा अहसास देते हैं और जाने अनजाने में समझ का दायरा बढ़ जाता है।
पुस्तक पढ़ना ध्यान लगाने जैसा लगता है। इस अहसास का दायरा पुस्तक ही नहीं , कोई भी बेहतरीन पत्रिका , उम्दा लेख तक बढ़ सकता है जब वह पढ़ते वक़्त जेहन में उतरने लगता है। चिंतन मनन सब जारी रहता है अपना समय लेते हुए। याददाश्त , ज्ञान बढ़ना तो अनुषांगिक है ही। पुस्तक पढ़ने की प्रेरणा कही से भी मिल सकती है। एक दिन कहीं पढ़ा एक कैदी ने365 दिनों में 162 किताबें पढ़ डाली उतनी तो नहीं पर हाँ साल भर में मैंने भी२५ किताबों के साथ सफ़र तय कर डाला।कुछ लेखकों को -जैसे नरेंद्र कोहली – को पढ़ना मात्र ही पाठकों के श्रेष्ठी वर्ग में शामिल होने के समतुल्य महसूस कराता है।
नई पुस्तक ढूंढना अपने आप में रोमांचकारी है। यह सामान्य प्रवृति है कि किताबों का चयन भी नवरस यानी श्रृंगार, हास्य, अद्भुत, शांत, रौद्र, वीर, करुण, भयानक और वीभत्स की तरह तात्कालिक मनोदशा पर निर्भर करता है। जब आप अवसादग्रस्त महसूस करते हैं तो आप प्रेरक किताब ढूंढते हैं,जब नई जगह के बारें में जानना चाहते हैं तो यात्रा वृतांत खोजते हैं।इसी क्रम में कभी पौराणिक ,कभी ज्ञानपूर्ण , व्यावहारिक , विचारशील……… अभिमन्यु के चक्र की तरह ….। परन्तु यहाँ इसके अंत का इंतज़ार नहीं रहता।
शायद लेखन पठन इस तेज़ गति की दुनिया के साथ कदम ताल नहीं बिठा पाए अथवा यूँ कहें दुनिया की अंधी दौड़ में लेखन पठन ने शामिल होने से इंकार कर दिया ।
ब्लाग KapsRead पर की गई पुस्तक समीक्षा Facebook पर साझा करते वक़्त महसूस हुआ कि अधिकांश व्यक्ति दृश्य /श्रव्य इन्द्रियों के वशीभूत रहते हुए ज्ञानेन्द्रियों को दुबका देते हैं उन्हें शायद नहीं पता कि लेखन पठन का आनंद क्या है ।
शब्द भंवरजाल नहीं वरन जिंदगी के उतार चढाव के अनुभवों का बयां है । संगीत ही नहीं शब्दों का साथ भी रूहानी होता है । पढ़ना लिखना जारी रखना मनुष्य होने की निशानी है ।
साहित्य लेखक पाठक के मध्य ही नहीं वरन आत्मा के साथ संवाद है। साहित्य आत्मा की भाषा है । मानवीय संवेदनाओं का शुमार चाहे झांकी में हो अथवा पुस्तक में – वे सम्बन्ध स्थापित कर लेती है।
आज एक पत्रिका पढ़ते ख्याल आया कि क्यों किताबों की चर्चा अक्सर पत्र-पत्रिकाओं के अंत में होती है – शायद ये किसी आकर्षण की मोहताज नहीं होती कि शुरुआती पृष्ठों पर ही छपे। अंतिम पन्नों पर भी ये अपनी चमक कायम रख सकती है।
सोचने लगी -क्या प्राप्त होता है किताब पढ़कर – एक सुकून , एक अन्य अनुभव , एक और कहानी , और इसी तरह कई एक और…..
विद्वान Joseph Addision का कथन सच ही है कि “Reading is to mind what exercise is to the body.”