माँ

मेरे सुकून का एक ठिकाना
सान्निध्य में माँ के एक बिछौना
बनूँ वट छाया कोशिश उसकी
रोकूं तपिश जहान भर की
होती क्यों ना वह बेपरवाह
आस -पास औरों की तरह
अहसास का पता पा जाती है
शायद खुद को मुझमें पाती है


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