मदद भी दान की एक श्रेणी

आज  जॉय ऑफ़ गिविंग पर लेख पढ़ा। अब तक दान के बारें में  भी यही जाना  था पैसों का दान  ,  वस्तुओं का दान । महादानी बिल गेट्स  ,  अजीम प्रेमजी  ,  वारेन बुफे  आदि ।  लेकिन सोच का विषय यह है कि मदद भी तो एक तरह का दान  है। परन्तु इसको कभी किसी ने दान की श्रेणी में रखा हो याद नहीं पड़ता । लगता है की अमूर्त विषय होने के कारण  यह इतना सुनने , पढ़ने में नहीं आया।

 मिलियन , ट्रिलियन डॉलर /रूपए सब दिखाई देते हैं। परन्तु यह दिखाई नहीं पड़ता । सही है , न दिखाई देने के कारण  तो ईश्वर का वज़ूद भी खतरे में माना  जाता रहा है। हालाँकि यह दीगर बात है कि इससे ईश्वर पर श्रद्धा का सैलाब कम नहीं हुआ वैसे ही मदद का महत्व दिखाई दे ना दे महिमा कम नहीं।

कहीं पढ़ा था ” ज़िन्दगी की डॉट्स कनेक्ट अवश्य होती है। ” हर वक़्त ज़िन्दगी में इस हाथ दे , उस हाथ ले -संभव नहीं , जरूरी भी नहीं। पर मदद ऐसा माहौल उत्पन्न कर देती है कि आपके आस पास  हर कोई आपका मदद ग्राही होता है। यह आपका विस्तार ही है।

पर इस प्रक्रिया में भी कई शर्तें हो सकती है –

1. मदद मांगने का साहस , यह भी मजबूत व्यक्तित्व का हिस्सा है। साधारण या कमजोर को मदद मांगने में भी हिचक रहती है , डर लगता है -अगला क्या सोचेगा आदि। सौ तरह की बाधाएं  सोच से ही खड़ी कर लेता है। जिसको स्वयं पर विश्वास हो वही सहयोग  मांग सकता है।                                                                                   

 निज अनुभव से एक गरीब , लकवाग्रस्त की सरकारी योजना अंतर्गत पेंशन चालू करवाना पात्रता से सम्बंधित सम्पूर्ण दस्तावेज तैयार रखने व मदद मांगने के उसके साहस के ही परिचायक थे ।

2. या फिर मददगार की पहचान हो।

यह बात अलग है कि सहायता करने के लिए आपको अपने अधिकतम तक  प्रयास / स्ट्रेच करना पड़ सकता है अतः माद्दे की महत्ता है। मदद का कोई नाप , पैमाना नहीं होता। यह करने वाले को  प्रफुल्लित बनाये रखती है। व्यक्तिगत लाभ /सोद्देश्यता  की बात करें तो तसल्ली इतनी ही है कि सहायता करने वाले का बोझ हल्का हो जाता है और ग्राही की राह आसान हो जाती है। ग्राही की संतुष्टि आपकी तसल्ली के स्तर को निर्धारित करती है। कई बार पाने वाला संतुष्ट नहीं भी होता लेकिन आपके सुकून का कारण वह संतुष्टि होती है  कि मदद के प्रयास आपकी सीमा के अनुरूप अधिकतम थे।

मुझे याद नहीं पड़ता कि हमारी शिक्षा प्रणाली भी मदद के कोई पाठ संकलित करती  है। मदद  हमारे समाज में तवज्जो  प्राप्त  नहीं है। शायद लोग समाज की बुनी पेचीदगियों से घबराते है या उलझना नहीं चाहते नहीं तो सड़क दुर्घटना में घायल को तमाशबीन की तरह देखकर आगे न बढ़ते।

हालाँकि समाज में NGO की अवधारणा  मौजूद है। इन NGO के उद्देश्य तो  पुण्य प्रसूत होते हैं लेकिन वे अभी  तक इस समाज में पैठ नहीं जमा पाए। वजह उनका परिणाम न दे पाना। जिस गति / संख्या में उनकी स्थापना  हुई है उस गति से समाज में बदलाव नहीं नज़र आया। देश में बड़ी संख्या में कार्यरत गैर सरकारी संगठनों से समाज में सुधार भी प्रभावी संख्या में दिखाई देने थे । वास्तव में ऐसा हुआ नहीं।

कई अभिनेता , व्यवसायी आदि NGO से जुड़े  हुए हैं । पर गहरे जाने पर पता चलता है अँधा बांटे रेवड़ी ….

यद्यपि मदद के सरोकारों की कमी नहीं – आसपास नजर पसारिये – किसी बच्चे को अकादमिक विषय समझने में , समान रास्तों पर पड़ौसियों को लिफ्ट देने में  , घरेलू कामगार के बच्चों के स्कूल के , अन्य योजनाओं के फॉर्म भरने में  , रास्ते में पड़े पत्थर या काँटों को हटाने में, जिससे आप अभी अभी बाल बाल बचें हैं,  आदि आदि।

सहायता एक परंपरा को भी जनम देती है। मदद पाने वाला , करने वाले का  केवल कृतज्ञ ही नहीं बल्कि उस परंपरा से सीखते हुए अन्य के सहयोग के लिए भी प्रयासरत देखे गए हैं।

जीवन की इस यात्रा में किसी की मदद इनकम टैक्स के सेक्शन 80G में छूट दिलाये / ना दिलाये ज़िन्दगी का return फाइल करते वक़्त तसल्ली जरूर दिलाएगी ।