बिस्कुट

दरवाजे पर खटखटाहट हुई। 

दौड़ कर खोला। पास के बाज़ार ही तो गए थे ,आ गए होंगे। 

पर यह तो कोई फौजी था।

अनजान को चोखट पर देख कर सकपका गयी।

फिर सोचा कोई रास्ता भूला होगा।

 फोटो दिखाई और पूछा “ये इनका घर है “. विस्मय से उत्तर दिया “हाँ “.

“कृपया बाहर आएं”। 

शंका के बादल घिर आये। अनजान के हाथ में यह फोटो कैसे ? मुझे बाहर क्यों बुला रहा है ? पर बोल न फूटे।

बाहर आयी। आकर मैं धक् रह गयी।

“ये” खून से लथ पथ । नन्हा  माँ माँ चिल्लाये जा रहा था ।

मेरा खून ठंडा पड  गया। गले से आवाज़ भी नहीं निकल रही थी। कुछ समझ नहीं आया।  अभी तो नन्हे  के हठ करने पर नज़दीक  के बाज़ार से उसे बिस्कुट दिलाने निकले थे।

पास खड़ी एम्बुलेंस  से निकल डॉक्टर ने नब्ज टंटोली और हाथ वापस रख दिया।

पड़ोसी  ने बताया आतंकी ने भागते भागते इन्हे गोलियों के आगे कर दिया।

एक के बाद एक तीन गोलियां सीने के पार चली गयी।

नन्हा सुबक रहा था हाथ में खून से सने बिस्कुट लिए हुए ।