निवाला (लघुकथा)

अस्पताल के बिस्तर  पर सोचते सोचते कब नींद आई   पता ही नहीं चला। जाग आई   तो आधा आंसू अभी भी आँख के कोने पर पड़ा था। सिर भारी  था। पुलिस वाला कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

 इस महामारी  ने तो सबकुछ  छीन लिया  । लॉकडाऊन  के बाद के अफरा तफरी के माहौल में अचानक फैक्ट्री बंद हो गयी। सेठ ने रास्ता दिखा दिया।

गांव पहुँचने पर १४ दिन घर से बाहर निकलने पर सरकार ने पाबन्दी लगा दी। आमदनी का कोई ज़रिया   न बचा। घर का राशन ख़त्म हो गया।

बच्चों को भूख से बिलबिलाते देख घरवाली ने बचे खुचे आटे का घोल बनाकर पिलाना शुरू कर दिया। रहा न गया। हालांकि अभी पाबन्दी के कुछ और दिन शेष थे।  उधार लेकर ठेला शुरू किया ही था। पर किस्मत में अभी कुछ और  झेलना बाक़ी  था।

गए हफ़्ते मोहल्ले में लगे शिविर में कोरोना की जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आ गयी। चिकित्सा विभाग की टीम घर पहुँच गयी। पाबंदी में ठेला लगाते देख पुलिस में केस दर्ज कर  इस अस्पताल में भर्ती कर दिया। 

उस दिन सरकार की तरफ से राशन बंटने भी  मौहल्ले में आया था। पर पता चला हमारा नाम जरूरतमंदो की सूची में नहीं था।

अब उन्हें क़िस्मत के निवाले पर छोड़ आया हूँ।