तुम

जब भी कही तुम्हारे बारे में पढ़ती हूँ रूह कांप जाती है कितनी बार मरी होगी तुम पूर्णतया निह्शवास होने से पहले। जितनी साँस उतनी मौत। असहाय , अकेली आत्मा संग ।केवल शरीरी । और शरीर -चीथ।त्यक्त । इस समाज को स्त्री की अब ज़रूरत नहीं । वह सिर्फ़ पुरूषों से काम चलाएगा। कल तुम गई हो , आज सुबह भी सुना था कोई क़तार में थी यह शृंखला अब मात्र पुरूष मौजूदगी पर आकर ही थमेगी। यहाँ स्त्री जन्म से ही शक के दायरे में है तभी तो किसी ने यह भी फ़रमान सुनाया कि वह किसी के साथ भाग गई होगी ।काश तुम उस दिन भाग सकी होती।कितना धिक्कारा होगा तुमने स्वयं को-मैं किस वहशी समाज की वाशिंदी।तुम चीखी होगी पर वो तो बहरे थे।पर सच मान सहज न होता तेरा जीना। जीकर तो तू रोज़ मरती। सहानुभूति के दिखावे से तेरा घाव न भरता। हरा ही होता।यहां इनसे सहानुभूति से ज़्यादा उम्मीद रखना ही बेमानी है। औक़ात से परे है।जमीर किसी मे होता तो एक बार तुम्हारी जगह अपने किसी को रखकर तुमबीती से रूबरू होकर देखते ।अफ़सोस न्याय तुझे अब संभव नहीं – कोई तुझे तेरी पुरानी ज़िंदगी नहीं दे सकता।तू इतने बरस मौजूद रहीं- नहीं तो यहाँ पैदा होते ही मारने का भी चलन है ।ख़ैर तू अब जंगली दोपायो के बीच न रही यहाँ ज़िंदा भी भय से लाश है।तूने भी अब तक झेला ही होगा। वे घूरते , फबतियाँ कसते ,ज़िंदा जलाते,जान लेते कभी न अघाते। और शक का ज़हर तुझ पर उलीचते।यह तंत्र तेरे लिए नहीं-तू तो नाहक ही जीने की कोशिश कर रही थी।कसूर तेरा बस इतना था कि वो ज़िन्दा पत्थर थे और तुम पत्थरों के बीच हीरा थी।शायद तुमने यही कहा होगा “अबके जनम मोहे बिटिया न कीजो”।