छुट्टी

छुट्टी की शुरुआत कैसे हुई या कैलेण्डर कैसे निर्धारित होता है -जानना रोचक विषय हो सकता है। लेकिन यह तयशुदा बात है कि कैलेण्डर वह स्थान है जहाँ लाल निशान सर्वप्रिय है। क्योंकि यहाँ इस निशान का अर्थ है अवकाश । इसके अतिरिक्त याद नहीं पड़ रहा जहाँ लाल निशान उत्साहवर्धक हो , ख़ुशी संचारित करता हो ।

अधिकांशतः तो यह निशान चाहे प्रकृति के लिए हो  या पुस्तकों  में   – सब जगह ख़तरे का ही द्योतक है। नदियों का लाल निशान के ऊपर बहना, उत्तर पुस्तिका में  , सेवा पुस्तिका में  , चौराहे पर सब जगह यह निशान भयभीत करता है।

छुट्टी के लाल निशान  की महिमा ही अलग़ है। फिर घोषित छुट्टी के अलावा -चाहे आधे दिन की , या अचानक घोषित -कैसी भी हो आम की हर किस्म की तरह  ख़ास होती है। ग़ालिब के आमों की तर्ज़ पर –

“मुझसे पूछो तुम्हे खबर क्या है आम के आगे नेशकर क्या है ”                                                                                      *( नेशकर=गन्ना )

– अवकाश की ख़ुशी की महत्ता अव्वल दर्जे की है।

जैसे आम की किस्में होती है – दशहरी , चौसा, फ़ाज़ली   आदि  वैसे ही अवकाश को भी वर्गीकृत किया जा सकता है। आधे दिन का , अचानक  , लम्बा सप्ताहंत  ,  उपार्जित , सप्ताहंत आदि आदि।

आधे दिन का या अचानक घोषित  अवकाश  दशहरी आम सरीखा सा   – छोटा सा  पर  मिठास भरा। लम्बा सप्ताहंत  चौसा की तरह  अपरिमित मिठास वाला , उपार्जित अवकाश जैसे फाज़ली  आम -जिसकी बारी  सबसे अंत में आती है और किसी भी काम – जैसे अचार ,जैम बनाना की तरह-उपयोग में लिया  जा सकता है यथा  घरेलु  कार्य ,घूमने जाना  आदि। सप्ताहंत की प्रकृति  तो जैसे कोई भी आम जिसमे किस्म की शर्ते लागू नहीं होती बस प्राप्ति मात्र ही संतृप्त  कर देता है।

कभी कभी विचार करने पर लगता है कि शायद छुट्टी से भी अधिक प्रिय उससे पहला दिन होता है। स्कूल के दिनों  में रविवार से अधिक प्रिय शनिवार होता था। अब शुक्रवार अधिक अच्छा लगने लग गया है। तभी तो कहा जाता है………  मिलने से ज्यादा इंतज़ार पसंद आया “

अगली छुट्टी के इंतज़ार में…..