घोंसला

पडोसी के दरवाज़े  पर  देर से हो रही खटखटाहट सुन कर मैं बाहर आयी। देखा तो काम वाली बाई खड़ी थी।

 “इत्मीनान रख। बुजुर्ग लोग हैं, धीरे धीरे ही खोल पाएंगे “.

वह दौड़कर मेरे पास आ गयी। उसके चेहरे पर घबराहट थी,  पसीना पसीना हो रही थी।

 “नही दीदी। आज तो कुछ गड़बड़ है। मुझे आधा घंटा हो गया है। इतनी देर बाऊजी  कभी नहीं लगाते। ” कुछ गड़बड़ नहीं – मैंने उसकी आशंका को झटकते हुए कहा।

“घंटी बजा कर देख। हाथ से (दरवाजा) पीटना उन्हें सुनाई नहीं दे रहा होगा।”

“बजा कर देखी दीदी, कोई नहीं सुन रहा “

“तू हट जरा मुझे कोशिश करने दे “

घंटी दबाई , दरवाजा बजाया पर सब बेकार। किसी ने नहीं खोला।  अब तो चिंता की लकीरें मेरे माथे पर भी आ गयी।

पांच -दस मिनट और कोशिश करने के बाद भी स्थिति जस की तस रही। इतने में कुछ  और पडोसी भी इकट्ठा हो गए।

 अनहोनी की आशंका के चलते पुलिस को इत्तला करना उचित समझा।

पुलिस आयी।  कुछ देर  प्रयास के बाद दरवाजे को तोड़ डाला।

अंदर का दृश्य देख सभी अवाक् रह गए।

बाऊजी  बिस्तर  पर मृत पड़े थे और उनकी लकवाग्रस्त पत्नी बिस्तर के पास । उनके आधे हिस्से में लकवा था और वह चलने, बोलने में असमर्थ थी।

बाऊजी  को गयी रात हृदयघात हो गया और  उनकी  पत्नी किसी तरह घिसटते घिसटते यहाँ तक पहुंची । और यहीं बैठी रह गयी।

“कोई उनके बच्चों को सूचित तो कर दो”.

” अब उनकी क्या जरूरत है ” किसी ने कहा।