गूँज

बरसात के मौसम में शाम और काली हो जाती है। आज दोपहर से ही बारिश हो रही थी। और बादल अभी भी छंटे नहीं थे। मुरुगन घर जाने की जल्दी में था।  पंचायत भवन में उसकी पारी  का समय ख़तम होने वाला  था ।  वह जल्दी जल्दी गलियों की बत्तियां जलाकर घर लौट जाना चाहता था।  बिजलियाँ रह रह कर कड़क रही थी। स्विच बोर्ड के पास जाते जाते वह सोचता जा रहा था  कि गोधूलि से पहले ही इतना अँधेरा हो गया है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा।

 बोर्ड के पास पहुँच कर उसने जैसे ही बत्तियां जलाने  के लिए हाथ उठाया तो ची ची ची ची का शोर मच गया। उसने हाथ पीछे खींच लिया। दुबारा कोशिश करने के लिए जैसे ही हाथ आगे किया फ़िर ची ची ची ची  गुंजायमान हो गया। 

अब वह क्या करे। अँधेरा गहराता ही जा रहा था। कुछ देर और हो गयी तो गजब हो जायेगा।  जनता और जनार्दन सबके फ़ोन दनदनाने लगेंगे। वह असमंजस में पड़ गया। उसने टोर्च जलाकर देखा। चिड़िया और उसके तीन छोटे छोटे बच्चे घोंसले में सहमे से बैठे थे। उसका कलेजा मुँह को आ गया। अगर उसने इनकी चहचहाट को अनसुना कर स्विच दबा दिया  होता तो घोंसले में आग से ये चारों दफ़न हो जाते। वह इस अनहोनी की  कल्पना मात्र से ही  सिहर उठा।

दूसरी तरफ़ फ़ोन की घंटियां बजनी शुरू हो गयी थी। मुरुगन अब जबरदस्त द्वन्द में था। फ़ोन किनारे रख तेज कदमों से इधर उधर घूमने लगा। बत्तियां जगाकर  पंछी के घर अँधेरा करने को  वह स्वीकार नहीं कर पा रहा था। और न जगाने पर पूरे गांव में अँधेरा छा रहा था।

कुछ मन बना तेज चाल से वह सरपंच के घर पहुंचा। वे घर के बरामदे में टहलते मिल गए। ठन्डे मौसम में भी पसीने की बूंदे मुरुगन के चेहरे पर देख सरपंच ने कारन पूछा।  उसने बिना दम भरे एक ही सांस में सारा क़िस्सा सुना दिया। पंचो को इकट्ठा कर निर्णय लिया गया।

चिड़िया के बच्चों के उड़ने तक लोग घरों के बाहर शाम को लालटेन -दीपक जलाकर गांव की गलियों का अँधेरा मिटायेंगे। चिड़िया की चहचहाट सुन ली गयी।