खिड़की वाली लड़की

 चिंकी की माँ को काम करते करते जब शर्मा जी के घर का नंबर आता तब तक दोपहर के दो बज चुके होते। चिंकी माँ के साथ ही एक घर से दूसरे घर घूमती रहती।  उसकी उम्र रही होगी कोई  4 – 5 साल । अभी तक ना वह माँ के बगैर रहना सीख पाई और ना माँ उसे घर पर अकेले छोड़ने को तैयार थी। चिंकी के बापू भी मज़दूरी पर चले जाते थे।

शर्मा जी के घर पहुँचते  ही चिंकी दौड़कर उनके बाहर वाले कमरे की खिड़की में बैठ जाती और ताकती रहती। देर तक उसी मुद्रा में बिना हिले डुले बैठी रहती। उसका यह हर रोज का नियम था।

इस उम्र की बच्ची को एक ही जग़ह लम्बे समय तक बैठा देख कर मिसेज शर्मा को आश्चर्य तो अवश्य होता पर वह मन ही मन खुश भी होती। सोचती ” चलो अच्छा ही है एक जग़ह ही बैठी रहती है वरना उछल कूद करने पर टोकना पड़ता। सामान की टूट फूट का डर रहता। घर गन्दा होता वो अलग।”

चिंकी की माँ शर्मा जी के  घर का काम निपटा कर जब जाने को होती तो वहीं खिड़की से नीचे उतर चिंकी  माँ के साथ चली जाती। उसका ना कोई चीज़ के लिए जिद्द करना ना कोई शैतानी  करना – मिसेज शर्मा को सब अच्छा ही लग रहा था।

पर मानव स्वभाव से संदेही होता है। आम धारणा के विपरीत कोई भी कार्य उसमे संशय पैदा कर देता है फिर चाहे उसमे किसी का कोई नुक़सान नहीं हो। ऐसा ही कुछ मिसेज शर्मा के साथ भी हुआ। उस रात वह चिंकी के बारें में देर तक सोचती रही। शर्मा जी को भी चिंकी की आदत के बारें में बताया। शर्माजी ने बात को टालते हुए कहा ” लो अब तुम्हारे शक के दायरे में मैं ही नहीं वह बच्ची भी आ गयी। कहाँ बैठती है , क्या देखती है। ” वे मुस्कुराते हुए बोले ” मेरी तरह तुम्हारे से डर कर वह भी बेचारी एक कोने में बैठी रहती होगी”. मिसेज शर्मा थोड़ा नाराज़ होते हुए बोली ” आप भी ना ! मेरी किसी बात को गंभीरता से नहीं लेते , मज़ाक समझ कर उड़ा देते हो।

“अच्छा ठीक है फिर कल उस बच्ची से पूछ लेना कि वह खिड़की में ही क्यों बैठी रहती है , घर में इधर उधर घूम कर चीजें उलट पुलट कर क्यों नहीं देखती। तुम्हारे इस गंभीर मुद्दे का हल उसी के पास होगा ” मिसेज शर्मा नाराज़ होकर उठ कर चली गयी। 

अगले दिन मिसेज शर्मा थोड़ी सतर्क थी बीती  रात की बात अभी भी उसके दिमाग में थी।   वह चिंकी और उसकी माँ का इंतज़ार ही कर रही थी कि वे दोनों आ गयी। आदत अनुसार  चिंकी आते ही कूद कर खिड़की में बैठ गयी।

मिसेज शर्मा उसे दूर से ही देखती रही। चिंकी खिड़की से दूर दूर तक नुक्कड़ पार  झाँकने की कोशिश करते हुए ,जैसे  दिखाई देने की हद से एक क्षण भी किसी को ओझल नहीं होने देना चाहती या गवाना नहीं चाहती। करीब आधे घंटे के इंतज़ार के बाद कुछ आकृतियाँ उसे नज़र आयी।  चिंकी उन्हें देख खिल उठी।  वो कुछ और नज़दीक आईं तो देखा कि नीली ड्रेस में चार पांच बच्चियां स्कूल की बस से उतर कर आ रहीं थी। चिंकी उन्हें बड़ी मुग्धता से देखे जा रही थी जब तक वे दूसरे छोर की तरफ़ जाते जाते ओझल नहीं हो गई।

उनके जाने के बाद मिसेज शर्मा ने चिंकी के पास जाकर प्यार से पूछा ” स्कूल जाओगी ?” बच्ची हतप्रभ जैसे उसे मन का खिलौना मिलने जा रहा है।

मिसेज शर्मा ने अगले दिन चिंकी को स्कूल में भर्ती करवा कर चिंकी और अपने मुद्दे का माद्दा ढूंढ लिया था ।