कष्ट तुम्हारा स्वागत है

विपत्तियों से रक्षा कर यह मेरी प्रार्थना नहीं ,मैं विपत्तियों से भयभीत न होऊँ ! गुरुदेव टैगोर की पंक्तियों के साथ कष्ट तुम्हारा स्वागत है। तुम्हारे आने पर अंतरतम तक असहज़ हो जाते हैं। पर विवशता यही है कि  तुम्हें आने से रोका नहीं जा सकता। तो  सोचा क्यों न तुम्हारा स्वागत करके देखूँ । हो सकता है तुम्हारे प्रति मेरी दुर्भावना कम हो जाए , सम्बन्ध सहज हो जाएँ ।

 ये दीगर  बात है जब भी तुम आए हर बार तुमने जीवन का  पाठ पढ़ाया ।मैंने खुद को अधिक संतुलित, अधिक परिष्कृत पाया ।सुधार की गुंजाइश अब भी है।चाह मेरी स्थितप्रज्ञ होना है (तुम्हारे आने जाने का कोई प्रभाव मुझ पर ना पड़े)

 तुम बहुरूपिये हो। हर बार रूप बदल कर आते हो।कभी सजा, कभी दर्द , कभी व्याधि, कभी वियोग।और असमंजस बढ़ जाती है।  तुम्हारी तीव्रता कब अधिक होती है ठीक ठीक नही कहा जा सकता जब तुमसे सामना होता है तब या तुम्हारी जुगाली करने पर या फिर जब खुद पर पकड़ कम होती है तब।

खुद से जुड पाने पर महसूस होता है कि अपना भीतर शायद ही कभी कष्ट देता है।

कष्ट तुम बिना भेदभाव के सबके सगे लगते हो। कभी झंझावात लाते हो , कभी ज़िंदा को बुत बना देते हो।शहीद के परिवारों को कल देखा।तुम भयानक हो । चलती फिरती ज़िंदगी में निर्वात पैदा कर देते हो।

 तुम्हारे आगमन पर विवेक पर पर्दा पड़ जाता है। हालाँकि तुम्हारा आना न आना इच्छा पर निर्भर नहीं ।

 तुम जीवन का अन्योन्य हिस्सा हो फिर तुमसे हिचकिचाहट क्यों ।तुम जीवन का स्याह पक्ष हो किंतु सच भी हो। तुम धोखा भी हो तुम मृत्यु भी।पर प्रश्न है तुम हो ही क्यों ? या  तुम मात्र शब्दरूप हो असल सिर्फ परिस्थितियाँ है?

 एक सफ़र के दौरान विचार आया सभी यात्री चाहे एक ही विमान में यात्रा कर रहे है किन्तु मंज़िल तो सब की अलग अलग है उसी तरह जीवन के सफ़र में भी हर एक का गन्तव्य  अलग अलग है फिर तुलना क्योंकर।यह तुलना भी तो कष्टदायी है। तुम्हारा कारण है।

तुम्हारे विपरीत सुख भी या तो मरीचिका है या कुछ नहीं । ढूँढने पर या तो ताउम्र ना मिले या मिले तो चिता पर। फिर वहाँ भी मिले तो मिले ।ना भी मिले।

ओशो अनुसार जो घट रहा है उससे सम्बद्ध मत हो। जब यह तथ्य गहरे पैठ बना लेगा तब शायद जीवन आसान हो जाए ।

वहीं स्वामी विवेकानंद कहते हैं संसार में भला बुरा जो कुछ होता है कुछ भी हमारे लिए अनिष्टकारी नहीं। शास्त्रों ने इसी को अप्रातिकूल्य कहा है।

कष्ट तो राजा राम को भी आये थे पर सुना है उन्होंने कष्ट का प्रबंधन कर लिया था।

पर क्या साधारण मानव यह सब कर पाने में सक्षम है ? यही यक्ष प्रश्न है।