एक संवाद – स्त्री

अनायास ही मैथलीशरण गुप्त की पंक्तिया याद आ गयी ” अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी ! आंचल में है दूध और आंखों में पानी……. ”
समाज की समझ- वह स्त्री की भावनाओं के सम्बल की महत्ता को कभी रेखांकित न कर सका। जीवन का दंगल भुजाओं के दम पर कभी भी जीता न जा सका। बस इसी बलाबल ने स्त्री को हाशिये पर डाल दिया। ऐतिहासिक साहित्य–“ वोल्गा से गंगा”- को पलटने पर पाते हैं कि वह पुरुष की भांति वर्जनातीत थी।
“महिला सशक्तिकरण ” टर्म/ पद ही बेतुका प्रतीत होता है। सशक्त तो जितने अन्य वह भी। ” पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा “, “पुरुषों से भी आगे ” यह तुलना ही शायद इस समस्या की जड़ है । ऐसा लगता है तुलना ही बांटती है । विज्ञान ने विभेद माना है कमतर नहीं।
अजीब लगता है जब सुनते हैं ” एक महिला ने कर दिखाया “…… महिला क्या ओरांगउटान है, असामान्य प्राणी है, जो उसके किसी काम पर आश्चर्य हो !!! अपितु वह भी एक साधारण प्राणी है। यह दीगर बात है कि जीवन की दौड़ में उसे पीछे धकेल दिया गया है। कार्यस्थल पर तो रोज एक नया वृतांत जुड़ा मिल सकता है , आम कार्य व्यवहार में ही भेदभाव। पुरुषकर्मी को मनाया जाता है कार्य सौंपते वक़्त। महिलाकर्मी को धमकाया जाता है, दबाव बनाया जाता है , नियम विरुद्ध कार्य करने हेतु।
समाज की दोहरी मानसिकता को समझने के लिए कार्यस्थल से बेहतर कोई स्थान नहीं।
कानून , नियम,दबाव , धमक सब स्त्री के पालनार्थ।
पुरुष की जिम्मेदारियां जैसे साझी जिम्मेदारी। अतः उनको पूर्ण करने में कोई रोक टोक नहीं।
तथाकथित प्रबुद्धजनो ने तो वर्ष में केवल एक दिवस ( 8 मार्च) उसके लिए तय किया है। ऐसे दिवस तो रेड डाटा बुक में सूचित लुप्त प्राय जीवों के लिए निश्चित होता है।
आश्चर्य है स्त्री की स्थिति पर पुरुषों द्वारा लिखा जितना उपलब्ध है स्वयं स्त्रियों द्वारा नहीं। यह तो उतना ही अनोखा है जितना स्त्री पुरुष के मनोविज्ञान पर कलम चलाये। वह कैसे सोचता है , कैसे निर्णय लेता है , उसकी मूल प्रवृति , प्रकृति क्या है आदि।ओशो की नारी पर पुस्तक खरीदते समय सोच में पड़ गयी -स्वयं को समझने के लिए दूसरों का सहारा। या ऐसा कोई विभेद ( पुरुष / स्त्री की पृथक पृथक सोच का ) है ही नहीं सिर्फ काल्पनिक / कथा मात्र है। क्या ही अच्छा होता मैं पुरुष पर पुस्तक लाती और तब स्वयं से तुलना करती – यह मैं हूँ / यह मैं नहीं हूँ -शायद ज्यादा उचित रहता।

रोजमर्रा की सहज सुलभ सेवाओं के लिए भी संघर्षरत नजर आती है / दुर्लभ बना दिया जाता है। राह चलती कई बार बालिकाओ को देखती हूँ -अत्यंत संकोच से भरी हुई, सिमटी हुई। बालक एक भी ऐसा नजर नहीं आता। क्यों वर्जनाओं से बालिका का दिमाग भर दिया जाता है, उम्रदराज व्यवहार के संस्कार बीजे जाते हैं ? समझ से परे है। वय के साथ जैसे बालक सीखतें हैं वैसे वे भी सीख जाएँगी।
संकोच भी किस बात का। धरती पर अन्य प्राणियों की भांति एक प्राणी होने का !!! इसमें अन्यथा तो कुछ भी नहीं। प्रकृति ने सभी को भिन्न बनाया है फिर केवल स्त्री ही संकोच के बोझ तले क्यों दबी हुई है।
परंपरागत समाज में स्थिति अधिक विकट है बनिस्पद आधुनिक , विकसित समाज के। कम से कम संकोच भरी नजर नहीं दिखाई देती , आधारभूत बाधा तो पार कर ही ली।
यह गुत्थी समझने में आज तक नाकामी ही मिली है कि आखिर स्त्री पुरुष में भेदभाव की शुरुआत हुई कब से व किस सोच से। क्यों उसे ही परिवार की सम्पत्ति / अहम् / इज़्ज़त का प्रतीक माना गया , पुरुष को नहीं।
इंसान ही मानते रहते तो क्या ठीक न था।