एक अदद सरकारी नौकर

जब भी सरकारी कर्मचारी का महँगाई भत्ता बढ़ता है अथवा बोनस की घोषणा होती है समाचार पत्रों में /  समाचार चैनलों की सुर्ख़ियां यही होती है कि सरकार के ख़ज़ाने पर ….” करोड़ का भार बढ़ा ।और अब तो एक समाचार पत्र ने तनख़्वाह का भार भी बता दिया है।वह भी तब जब संकट के इस काल में सरकारी    कर्मचारी का योगदान उल्लेखनीय साबित हो रहा है । 

आमतौर पर उसके योगदान की कभी चर्चा ही नहीं होती। जब तक वह रिटायर होता है तब तक उसकी    तनख़्वाह से होने वाली कटौतियों का उपभोग जनता द्वारा ही किया जाता है। वह ज़िन्दगी भर सिर्फ़    आँकड़ो का जमा ख़र्च करता है । वह अपने जीवन के अमूल्य घंटे /समय/ऊर्जा समाज के लिए देता है।   आचार / व्यवहार के भ्रष्ट होने की तोहमत हर कर्मचारी पर लगाना ईमानदार कर्मचारी का साहस तोड़ना है। अब तक यही परम्परा रही है कि कर्मचारियों के इस वर्ग के बारें में कभी प्रचारित नहीं किया गया।    अगर प्रचार होता तो उसका फ़ायदा भी समाज को ही मिलता। इतना नकारात्मक स्वरूप ईजाद कर दिया जाता है जैसे सरकारी कर्मचारी ही एक मात्र अपराधी है इस समाज में अव्यवस्था के लिए।जबकि मौजूदा शिक्षा , क़ानून , न्याय व अर्थ सभी व्यवस्थाएं समान रूप से ज़िम्मेदार है।

 संसाधनों के अभाव/सीमितसंसाधनों में सेवारतकर्मी कैसे कार्य जारी रखता है यह बिना व्यवस्था का    हिस्सा बने समझा नहीं जा सकता। सेवक की वृत्ति / का निर्वाह अत्यन्त दूभर होता है। वह हमेशा कुर्सी ही नहीं तोड़ रहा होता है। एक उपयुक्त कथा है -एक रसोइए के द्वारा राजा को खाना परोसते हुए सब्ज़ी का छींटा गिर पड़ा । राजा ने क्रोधित होकर फाँसी का फ़रमान सुना दिया। रसोइए ने तत्क्षण सब्ज़ी का पूरा डोंगा महाराज पर उँडेल दिया। पूछने पर बताया कि उसने यह ग़ुस्ताख़ी इसलिए कि कहीं महाराज पर यह दोषारोपण न हो कि उन्होंने एक छोटे (छींटे) से अपराध के लिए फाँसी की सज़ा सुना दी। तात्पर्य है कि सेवक की वृत्ति कठिन है/ निभाने के लिए जतन करने पड़ते हैं।कब उसे स्वघोषित नेता या नौसिखिया वकील अपने ताव दिखा जाता है उसे अंदाज़ ही नहीं होता वह तो बस निरीह प्राणी की तरह झेलता चला जाता है।सिवाय स्वयं को कोसने के उसके पास कोई चारा नहीं होता कि किस घड़ी में भर्ती की परीक्षा दी थी।साथ ही साथ चयन करने वाले बोर्ड को भी यह    कहते हुए कोसना जारी रखता है कि काश उस समय उसकी उम्मीदवारी को चयन बोर्ड ने ख़ारिज कर    दिया होता तो ये दु:ख नहीं झेलने पड़ते ।सोचते हुए कि नहीं पता था परीक्षा में उत्तर नहीं वरन् दु:ख लिख रहा है ।और बस एक ही काम आता थावह था उतर लिखना।

 विचार आया अभियन्ता दिवस, डाक्टर दिवस, शिक्षक दिवस की तरह प्रशासनिक सेवा दिवस कब       मनाया जाता है- जानने की इच्छा हुई, बहुत खंगालने पर  सिविल सेवा दिवस मिला 21 अप्रेल। शायद सामान्यज्ञ को सम्मान / स्वीकार्यता उतनी नहीं मिली जितनी विशेषज्ञों को।प्रिंट मीडिया अगर हर महीने उत्कृष्ट कार्य करने वालों के उदाहरण नहीं ढूँढ पाए तो छ: महीने में ही एक बार सही सरकारी व्यक्ति का मनोबल बढ़ाने वाले उदाहरण छाप सकता है।यहाँ कई नींव के पत्थर   कार्यरत हैं जो चुपचाप ही लगे हुए हैं। जब अख़बार में एक कालम फ़िल्मों के नाम, एक खेल, एक राजनीति के , एक जीवन तंत्र के नाम किया जा सकता है तो फिर एक कर्मियों के नाम क्यों नहीं। सेवारतकर्मी तो वैसे भी कार्यक्षेत्रमें जड़ों से जुड़े हुए होते हैं इनके अनुभवों को मीडिया साझा करें तो समाज में सुधारों को गति प्रदान की जा सकती है।                                                                                       वर्तमान में मीडिया ने इस दिशा में पहल की है।कर्मचारियों द्वारा किए गए सामाजिक सरोकार के कार्यों को समाचार पत्रों , चैनल पर स्थान मिलने लगा है।इस पहल /प्रयोग के जारी रहने पर काम करने वाले तो प्रोत्साहित होंगे ही , हो सकता है न करने वालों में भी परिवर्तन आ जाएं।